जिन्दगी की सुनहरी लड़ी

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जिन्दगी की सुनहरी लड़ी

जिन्दगी की सुनहरी लड़ी
ओम जपले घड़ी दो घड़ी
पुष्प जीवन का तेरे खिला
चोला मानव का तुझ को मिला

इसकी कीमत बड़ी से बड़ी,
ओम जपले घड़ी दो घड़ी
सारे विषयों से मुख मोड़ ले
प्रीत प्रीतम के संग जोड़ ले

बीत जाए न यह शुभ घड़ी,
ओम जपले घड़ी दो घड़ी
देने वाले ने सब कुछ दिया
शुक्र क्या तूने उसका किया
जिसने झोली पे झोली भरी,
याद करले उसे दो घड़ी

भलाई कर, बदी से बाज
आ परहेजगारी कर।
जो तुझसे हो सके तो खल्क की
खिदमत-गुजारी कर।
अगर ऐसा करेगा तो
खुदा इसका समर देगा।
तेरा दामन वही उम्मीद के
फूलों से भर देगा ॥