जय-जय ऋषिवर हे दयानन्द जय-जय कर
जय-जय ऋषिवर
हे दयानन्द जय-जय कर
आर्य जाति गौरव बखान,
वैदिक युग का कर कीर्तिमान।
ऋषि सन्तति करदी सावधान,
तुमने फिर हे आनन्दकन्द जय-जय।
गुरुदेव तुम्हारे गुण अनेक
मुख में है कवि के गिरा एक।
पुष्प के पराग पे ज्यों
भृंग की उमंग आज,
चन्द्र पर चकोर
बार-बार बलिदान है।
दीप ही ज्यों लक्ष्य है
पतंग को महान् एक,
दीन के हृदय में
प्रभुवन्दना की तान है।
सूर रसखान और
तुलसी के छन्दन में,
राम कृष्ण चर्चा की
अनोखी पहचान है।
निर्धन कवि कोऊ
काहु पै गुमान करे,
मोहे अपने देव
दयानन्द पै गुमान है।
प्रतिभा न पास विद्या
विवेक किसविध गुण गाए
प्रकाशचन्द-जय-जय।
ठग प्रपंचियों के विकट टोल,
अमृत में विष थे रहे घोल।
छाया घनघोर अंधकार मिथ्या पंथन को,
सुध-बुध ईश्वरीय ज्ञान बिसराया था।
वैदिक सभ्यता को अस्त-व्यस्त
करने के कारण,
पश्चिमी कुसभ्यता
ने रंग दिखलाया था।
गऊ विधवा अनाथ,
त्राहि-त्राहि करते थे,
धर्म और कर्म चौके
चूल्हे में समाया था।
रक्षक नहीं था कोई
भक्षक बने थे सारे,
ऐसे घोर संकट काटे
कुफेद-जय-जय।
जय वेद धर्म की बोल
खोलकर पोल संकट काटे
कुफेद-जय-जय।










