जवानी गई स्वांग सिनेमा घरों में।

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जवानी गई स्वांग सिनेमा घरों में।

जवानी गई स्वांग सिनेमा घरों में।
फैशन के झूठे आडम्बरों में ।।
बचपन में जो कभी शेरों से खेले।
भर करके मस्ती में हाथी धकेले।।
आज खो गये वो लता के स्वरों में।।1।

गठीले बदन और चमकते वो चेहरे।
लूटे लिये जा रहे हैं लुटेरे ।।
अनमोल जीवन सस्ती दरों में। |2 ||

पश्चिम की सभ्यता में गई देश भक्ति।
तामसिक भोजन में गई आत्म शक्ति ।।
जिन्दों में छोड़े ना छोड़े मरो में ।।3।।

पदों डिग्रियों की इच्छा ना मारे।
स्वार्थ के सिन्धु में कूदे हैं सारे।।
प्रेमी क्या रखा अब लैक्चरों में। । 4 ।।