जाते-जाते ये ऋषिवर कह गए।

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जाते-जाते ये ऋषिवर कह गए।

जाते-जाते ये ऋषिवर कह गए।
मेरे जो सपने अधूरे रह गए।

मानते कहना अगर ऋषिराज का।
और ही होना था भारत आज का॥
‘आशा’ सपनों के किले सब वह गए
मेरे जो सपने अधूरे रह गए….।

मेरी वसीयत याद रखना आर्यो।
सत्य को ही मन में अपने धारियो।
पाप की धारा में क्यों तुम बह गए
मेरे जो सपने अधूरे रह गए….।

आर्य जो महजबों में बंट गए।
देश के हिस्से इसलिए कट गए।
खुद को खुद ही आज
क्यों तुम दह गए
मेरे जो सपने अधूरे रह गए….।

हमने अपने भाई भी ठुकरा दिए।
हिन्दू मुस्लिम और ईसाई किए।
गैरों की मारों को चुपके सह गए
मेरे जो सपने अधूरे रह गए….।