जब निराकार और निर्विकार साकार बना दिया जग कैसे

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जब निराकार और निर्विकार साकार बना दिया जग कैसे

जब निराकार और निर्विकार
साकार बना दिया जग कैसे
जागृत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया
रचा मुक्ति का मग कैसे
क्या वस्तु लई जिसे देह रची
और बना दई रग रग कैसे
जब अपाणि पादो जवनो गृहीता
कोई पकड़ ले पग कैसे
तेरा कोई पकड़ ले पग कैसे
काशी काबे में पता नहीं
फिर बता पता लगता कैसे
सब धार रहा रम सब में रहा
फिर सब से रहा अलग कैसे
पृथिवि सूरज नभ में तारे
किस विधि रहा है तू धार
धन धन हो तेरी कारीगरी करतार

ये सूरज से चमकते पदार्थ
ऐसी चमक निराली कहीं नहीं
बरसे तो भर दे जल जंगल
आकाश में सागर कहीं नहीं
नरतन सा चोला सील दिया
सुई धागा हाथ में कहीं नहीं
पत्ते पत्ते की कतरन न्यारी
तेरे हाथ कतरनी कहीं नहीं
दे भोजन कीड़ी कुंजर को
तेरे चढ़े भण्डारे कहीं नहीं
वो यथायोग्य वर्ताव करे
मिल रियायात कहीं नहीं
दिन रात न्याय में न फर्क पड़े
तेरी लगी कचहरी कहीं नहीं
अखण्ड ज्योति अपार लीला
काहू ने न पायो तेरो पार
धन धन हो तेरी कारीगरी करतार

जाने किस विध गर्भ के अन्दर
दे पीड़ा तू बालक पन की
और जाने जवानी आई कहाँ से
कमी रही ना यौवन की
फिर बुढ़ापा देकर दिखाया सब
सो बनी सो एकदिन बिगड़न की
कोई पैसे पैसे को मोहताज फिरे
कोई कोठी खोल रहा धन की
कोई पी सङ्ग कामनी खेल करे
कोई रो रो रात करे तन की
कोई भटकते भटकते उमर गंवा दे
कोई तृप्ति कर रहे मन की
बन पर्वत भूमि कील खड़े
कहीं हरियाली छाई वन की
कहीं ताल समन्दर जल से भरे
कहीं चोटी चमकती पर्वत की
कहीं शरद वायु के झोंके चले
कहीं अधिक ताप गर्मी घन की
चातुर्मास घटा घिर आवे
बरस कर बहा दे तू जल धार
धन धन हो तेरी कारीगरी करतार

जब चार वेद छः शास्त्र पुकारे
सारे गुणों का शुमार नहीं
सब ऋषि मुनि सन्त महन्त थके
गा गा के पाया पार नहीं
जो करनी चाहे कर गुजरे
किसी काम में तू लाचार नहीं
जो कर दे सो नहीं बदल सके
किसी और का लेके सहारा नहीं
कर भक्ति डंके लिपट लिपट
भक्ति भूप से प्यार नहीं
ये “बस्तीराम” दरवाजे खड़ा
क्यों सुनते किसी की पुकार नहीं
सुख स्वरूप दर्शा दे अपना
खोल के अखण्डों द्वार
धन धन हो तेरी कारीगरी करतार
धन धन हो तेरी कारीगरी करतार
धन धन हो तेरी कारीगरी करतार