जब खजाना लुट गया
जब खजाना लुट गया
फिर होश में आये तो क्या।
वक्त खोकर दस्ते हसरत मल
के पछताये तो क्या ।।१।।
कुछ अमीरों और रईसों
ने समझ रक्खा है यह।
हम रहे जिन्दा बला से कौम
मिट जाये तो क्या ।। २ ।।
चूमती हैं पांव जिनके,
कुल जहां की निआमते।
उनकी नजरों में कोई फाकों
से मर जायें तो क्या ।।३।।
जिनको अपने और पराये की
नहीं मुतलक तमीज ।
उनको ईसाई-मुसलमा कोई
बन जाये तो क्या ।।४।।
लीडरों को लीडरी की
फिक्र दामनगीर है।
दर-दर ऋषियों की सन्तां
ठोकरें खायें तो क्या।।५।।
कास हर हिन्दू ‘मुसाफिर’
की तरह यह सोच ले।
धर्म के प्रचार में गर जान
भी जाये तो क्या ।। ६ ।।










