हे सोम ! प्रेम सुमन ! द्वेष-रहित करो मन

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हे सोम ! प्रेम सुमन ! द्वेष-रहित करो मन

हे सोम ! प्रेम सुमन !
द्वेष-रहित करो मन
है सहस्थान तेरा
मेरे हृदय मन में
परम पदस्थ हो हृदय-सदन में
हे सच्चे शिव सुन्दर राजन्!
हे सोम ! प्रेम सुमन !
द्वेष-रहित करो मन

दुर्मतियाँ देखो आ बैठीं
हो गया मन मेरा अवसन्न
हे अमृत बरसाने वाले !
सरसा दो सुमतियों से मन
हे सोम ! प्रेम सुमन !
द्वेष-रहित करो मन

दूर कराओ वैर और द्वेष
होवे हृदय में सुधा रस-श्लेष
प्रेम दो, भर दो हृदय के छाले
दुर्दशा मन की होवे अनागम
हे सोम ! प्रेम सुमन !
द्वेष-रहित करो मन

क्या कभी तुम इस
हृद-सहस्थान की
ऐसी दुर्दशा देख सकोगे ?
यह जीवन अब तेरे हवाले
हिंसा द्वेष रहित कर दो मन
हे सोम ! प्रेम सुमन !
द्वेष-रहित करो मन
है सहस्थान तेरा
मेरे हृदय मन में
परम पदस्थ हो हृदय-सदन में
हे सच्चे शिव सुन्दर राजन्!
हे सोम ! प्रेम सुमन !
द्वेष-रहित करो मन

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * ३१.८.२००५ २.४५ मध्यान्ह

राग :- यमन
राग का गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा

शीर्षक :- हृदय मन्दिर में देवों का ही राज्य
वैदिक भजन ८७९वां

*तर्ज :- *
0227-827

अवसन्न = उदास,शिथिल
श्लेष = मिलाप, संगम
अनागम = अप्राप्ति
सहस्थान = साथ साथ रहने का स्थान

प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇

हृदय मन्दिर में देवों का ही राज्य

हे सच्चे राजन्! यह हृदय तुम्हारा सधस्थ है।सहस्थान है। तुम परम पदस्थ होते हुए भी इस हृदय में मेरे साथ आ बैठे हो, आत: जब तुम कभी अपने इस सधस्थ में देवों की दुर्मतियां देखो, जब तुम यह देखो कि इस हृदय में देवों की सुमतियों की जगह दुर्मतियां प्रकट हो रही हैं, दिव्य वृत्तियों का विपरीत भाव हो रहा है तो तुम इस दुरवस्था को हटाने के लिए, हे ‘मीढ्व:’, हे अमृत के सिंचन करने वाले! मेरे सब द्वेषों को दूर कर दो, मेरे सब हिंसनों को हटा दो, ऐसे में यह द्वेष आदि कैसे रह सकते हैं?अपना प्रेम रस प्रवाहित करके मेरे द्वेष- भावों व हिंस्त्र वृत्तियों को बाहर बहा दो। हे सोम! तुम्हारे अमृत सिंचन के होते हुए, सचमुच यह द्वेष व हिंसा के भाव ही हैं जिनके कारण मेरे हृदय से देवों का राज्य हट जाता है।देवों की स्मृतियां उठ जाती हैं और ऐसी दुर्दशा उपस्थित हो जाती है।
हे सोम! क्या तुम कभी अपने इस पवित्र सदस्थ की ऐसी दुर्दशा देख सकते हो? क्या तुम्हें कभी अपने इस हृदय=सहस्थान की यह दुरावस्था सह्य हो सकती है? यदि नहीं, तो हे देव! हमारी तुमसे एक ही प्रार्थना है कि तुम इस हृदय में अपना ऐसा अमृत सिंचन करो कि इसमें द्वेष व हिंसा का अवलेश भी शेष ना रहे। तब मेरे हृदय में देवों का ही राज्य हो जाएगा, देवों का ही सुमति पूर्ण राज्य हो जाएगा।
🎧879वां वैदिक भजन🕉👏🏽