हे मेरे जगदीश तुम
हे मेरे जगदीश तुम,
सृष्टि के पालन हार हो।
मस्तक नवाकर प्रेम से,
प्रणाम बार बार हो ।
कर सके दर्शन नहीं
यह चर्म चक्षु, जो मेरे।
निराकार, सर्वाधार,
हो लेते नहीं अवतार हो।
मस्तक नवाकर प्रेम से
प्रणाम बार ही बार हो ॥ १ ॥
कण-कण में व्यापक हो कोई,
स्थान खाली हैं नहीं।
हर प्राणियों के प्राण हो,
जीवन के प्राणाधार हो ।
मस्तक नवाकर प्रेम से
प्रणाम बार ही बार हो ॥ २ ॥
अज्ञानियों से दूर रहते
ज्ञानियों के पास में।
हर जगह मौजूद हो
रखते नजर इकरार हो।
मस्तक नवाकर प्रेम से
प्रणाम बार ही बार हो ॥ ३ ॥
योगी, यति, ऋषि, मुनि कोई
तेरा पार पा सकता नहीं।
रक्षक हो सब संसार के
सबके तुम्हीं दातार हो।
मस्तक नवाकर प्रेम से
प्रणाम बार ही बार हो ॥४॥










