हर रोज छलकते प्यालों में इस देश की किस्मत लुटती है।
हर रोज छलकते प्यालों में
इस देश की किस्मत लुटती है।
दिन में हो शबाब की नीलामी
और रात में अस्मत लुटती है।
शादी हो जन्मदिन हो चाहे,
चाहे मौत किसी की हो जाये।
मरने वाले का गम है किसे,
प्यालों से प्याले टकरायें ॥
पीकर के नशे में झूमते हैं,
घर जितने भी मेहमां आये।
आखिर इस देश का क्या होगा,
कोई आकर हमको समझाये
दोजख की आग धदकते ही,
उस घर की जन्नत लुटती है॥1॥
पीते ही शराब के पानी को,
एकदम से कयामत आती है।
जाने कितने निर्दोषों के ऊपर
बिजली गिर जाती है।
अपहरण कत्ल की साजिश हो,
कितनों को भय खाती है।
हरवक्त ताक में रहते,
पुलिस के दलालों की बन आती है।
अपने ही तो इस पागलपन से
नादानों की दौलत लुटती है।॥2॥
जितने ये लोग बड़े बनते स्मिगलर
चोर हैं हत्यारे। पीते हैं खून गरीबों
का इसलिए तो कोठी और कारें ॥
अरबों खरबों धन लूट रहे
ये हर्षद मेहता हैं सारे।
काबू इन पर जो हो न सका
इस देश के गर्दिश में तारे ॥
हर लम्हे, लम्हे पर देखो तो
निर्धन की इज्जत लुटती है ॥3॥
इन जालिम जुल्मी लोगों
का जीवन है सुराही पैमाना।
किचन में कसाई खाना है,
घर बना हुवा है मयखाना॥
गाँधी की मजाक उड़ाई है,
नेहरू था इनका दीवाना।
भारत की ये किस्ती ले डूबे
मुश्किल लगता है बच पाना॥
शौहरत की बुलन्दी जो पाई थी
अब लगकर कीमत लुटती है।॥4॥
यह देश कपिल और गौतम का
श्रीराम ने जहां पर जन्म लिया।
नानक की अमर भक्ति,
दयानन्द ने वेदों का सन्देश दिया॥
गंगा यमुना का ये उदगम है,
बोलो तो कलंकित कैसे किया
अमृत को अमरता से तजकर
कर्मठ क्यों शराब का जहर पिया।
बेशर्मी के दौर में फंसकर ऋषियों
की विरासत लुटती है॥5॥










