गुणगान करो जगदीश्वर का

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गुणगान करो जगदीश्वर का

गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् बनाया/रचाया है
हर चीज अजीब रची उसने
हर खेल अजीब दिखाया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है

प्रातः ज्यों सूर्य निकलता है
हर शाम वो फिर वो ढलता है
हर मौसम रङ्ग बदलता है
कैसा फिर नियम बनाया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है

जो प्राणी जग में आता है
इक रोज यहाँ से जाता है
नित कर्मों का फल पाता है
प्रभु ने ये चक्र चलाया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है

इस ओर तितलियों को देखा
उस ओर मछलियों को देखा
फूलों और कलियों को देखा
मस्तक सबका चकराया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है
हर चीज अजीब रची उसने
हर खेल अजीब दिखाया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है

आकाश में बादल रहते हैं
धरती पर नदियाँ बहते हैं
जिस को हम सागर कहते हैं
सब कुछ उस प्रभु की माया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है

हर पेड़ में बीज समाया/बनाया है
हर बीज में पेड़ समाया है
कैसा करतब दिखलाया है
नहीं भेद समझ में आया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है

जिसने उसको पहचान लिया
अपना अङ्ग-रक्षक मान लिया
प्रभु भजन हृदय में ठान लिया
वो “पथिक” सदा हर्षाया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है
हर चीज अजीब रची उसने
हर खेल अजीब दिखाया है
गुणगान करो जगदीश्वर का
जिसने ये जगत् रचाया है