गीत स्तुति के गाऐ मन!

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गीत स्तुति के गाऐ मन!

गीत स्तुति के गाऐ मन!
स्तोता तू बन जा प्रवण
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
अगुआ बना किसी महिमामय देव को
उन्नत कर ले जीवन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!

जिन सिद्धांतों के सहारे
हुआ है स्थिर सन्सार
उसको ही कहते हैं सार्थक सुधर्म
विश्व सत्ता का आधार
ब्रह्माण्ड की भित्ति शील है
स्तोता है शीलवान बन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!

देवों का लक्षण है शीलता
विश्व-सत्ता का आधार
विश्वास देव का करते सभी
जो करता दान-विस्तार
नष्ट ना होता है उसका दिया
स्वाहा भरित उसका धन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!

देव में याज्ञिक भावना
भौतिक-अध्यात्मिक दर्शन
इन दोनों तत्वों के धर्म को
करता है वह अनुसरण
यदि देव शीलवान् है तो
द्युतिमान भी है प्रतिपन्न
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!

ऐसे ही क्रान्तदर्शी कवि का
कर ले ऐ मन !अनुसरण
केवल स्तुति सापेक्ष नहीं है
कर उस की भान्ति मनन
सत्य धर्मा है देव अगर
तू भी सत्यधर्मा बन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!

यज्ञानुष्ठान स्वयं भी कर
अग्रणी बन जा ऐ मन !
यज्ञानुष्ठान के बिना
कैसे बनेगा करण
यज्ञ अहिंसादि सत्यव्रतों का
धर्मयुक्त कर पालन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!

रोग नाशक अग्निदेव है
करता सब रोग विनष्ट
यज्ञ आधारित स्वास्थ्य भी
करता है दूर कष्ट
देह का कोई भी अंग-प्रत्यंग
स्वार्थी ना जाए बन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!

ऐसे ही व्रत हो मानसिक
जिनमें हो संकल्प दृढ़
मन में उठते ईर्ष्या-द्वेष को
खुद ही कर नष्ट
मानव समाज को अङ्ग मानकर
कर्तव्य-याज्ञिक तू बन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!
स्तोता तू बन जा प्रवण
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
अगुआ बना किसी महिमामय देव को
उन्नत कर ले जीवन
हो….ऽऽऽऽऽऽऽ
गीत स्तुति के गाऐ मन!