श्रद्धा से जो कर्म करते हैं श्राद्ध उसी को कहते हैं
वेदविहित पितरों की तृप्ति को तर्पण ही कहते हैं ॥
वृक्ष पहाड़ और नदी समुन्दर की सेवा ना तर्पण है।
किन्तु सुश्रुषा सेवा जो जीवित पितरों की तर्पण है।
वेद विरुद्ध जो चलें पाखण्डी पथ से भ्रमित वो करते हैं ॥ श्रद्धा से जो…
जीवित मात-पिता की सेवा ही सच्चा तर्पण और श्राद्ध
इसी में निहित है सत्यव्रती फल जो है ईश्वर से ही प्राप्त
बिन श्रद्धा के किए धर्म कर्म सदा ही निष्फल रहते हैं ॥ श्रद्धा से जो…
मृत्यु बाद तो मात-पिता को देह विहीन ही पाया है
फिर भोजन आच्छादन कैसा जब उनकी ना काया है
अक्ल के अन्धे बनो कभी ना, ज्ञानी जन ये कहते हैं ॥ श्रद्धा से जो…
तिरस्कार ना करो कभी भी मात पिता ऋषि आचार्यों का
प्राप्त करो आशीश प्रेरणा लाभ हो उनके सहकार्यों का
हृदय सदा निष्काम हैं जिनके वो निःस्वार्थ ही रहते है ॥ श्रद्धा से जो…
दूर रहो बगुला भक्तों से फैलाते जो अन्धविश्वास
करो भी ना सत्कार तुम उनका उलटा कर दो पर्दाफाश
ऋषियों की प्राचीन पद्धति ज्ञानी माना करते है ॥ श्रद्धा से जो….










