दिल कहता हैं कुछ कहूँ

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दिल कहता हैं कुछ कहूँ (धुन-दिल करता)

दिल कहता हैं कुछ कहूँ
ना कहूँ कुछ क्यों ना
कहूँ चुप कैसे रहूँ
ऋषियों के देश में फिरे
अनगिन लुटेरे। । टेक ।।
प्यारा वतन मेरा जीवन धन,
जीवन कण-कण सेवा में अर्पण।
दुश्मन कृतान का करके दमन,
क्यों ना करूँ में कर्त्तव्य
का पालन साधुओं के भेष में,
फिरें अनगिन लुटेरे ।।1।।

कोई जटाजूट कोई सफाचट्ट,
ऊपर से सन्त भीतर है कपट।
कोई योगीराज बन रहा नटखट,
कोई चरित्रहीन ब्रह्मचारी शठ डूबे
राग द्वेष में फिरें अनगिन लुटेरे ।।2।।

कहीं मसाले अन्दर लीद पड़ी
कहीं ब्लाटिंग पेपर की रबड़ी।
कोई ग्रीस मिला रहा धी अन्दर
कोई दूध में कर रहा छलछन्दर।
कोई फलों में ला रहा सैकरीन,
है एक से एक किसका यकीन।
देखू हमेश मैं, फिरें अनगिन लुटेरे ।।3।।

कोई पाप से धन और धन से
धर्म रखना चाहते बाजार गर्म।
नहीं दिल में दया न आँखों में
शर्म कहलाये भक्त करें नीचे
कर्म ‘प्रेमी’ मन क्लेश में,
फिरे अनगिन लुटेरे ।।4 ||