ढूँढता हूँ आज अपनी आवाज़ में आवाज़ कोई।

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ढूँढता हूँ आज अपनी आवाज़ में आवाज़ कोई।

तर्ज- ग़ज़ल

ढूँढता हूँ आज अपनी आवाज़
में आवाज़ कोई।
मुझे लगता है छुपा है
इसमें गहरा राज़ कोई॥

सो गया है फन मेरा काग़ज़ों
की कब्र में समा गयी
आवाज मेरी नीले-नीले
अब्र में फिर भी चाहता
दिल सचिन ‘सारंग’ लिख दू
अल्फाज़ कोई मुझे लगता है……

परखना चाहता हूँ
मैं मगर मजबूर हूँ खड़ा हूँ
पास मंजिल के पर फिर
भी दूर हूँ खोजता हूँ
अपने अन्दर सुन्दर सा
अन्दाज़ कोई मुझे लगता है……

अख़्लाक वफ़ा चाहत
सब ये ख़ाक में मिल जाते हैं
ख्वाब के वो सौदागर ना
ढूँढने से पाते हैं हसरतों में
ढूंढ़ता हूँ आज मैं परवाज़
कोई मुझे लगता है……