देश को नेताओ की नेताई मार गई।

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देश को नेताओ की नेताई मार गई।

देश को नेताओ की नेताई मार गई।
गरीबों को गरीबी हटाई मार गई।।

शासन को शासक की
रहनुमाई मार गई।
बेहिसाब नोटों की
छपाई मार गई।।
इस लिये देश को
मंहगाई मार गई। टेक।
अजादी के बदले में
बलिदान सैंकड़ों साल दिये।।

बहनों नें भाई पति पत्नियों
ने माताओ ने लाल दिये।
दई जवानी नौवानों ने मिली
हमें तब यह आजादी ।।

जिसकी कीमत दी थी हमने
हमें मिली नहीं वह आजादी।।

हिस्सों अन्दर भारत की
बटाई मार गई।
चीन पाकिस्तान की
लड़ाई मार गई।।

उजड़े हुये लोगों की
बसाई मार गई ।
टैक्सों से बंगला की
सहाई मार गई, ।।1।। इसलिये,

जो कहते वह करते थे
जो करते थे वही कहते थे ।।

मन से बचन से और कर्म से
सदा एक से रहते थे।
अब मन में कुछ और
वचन में कुछ है और
कर्म के अन्दर कुछ है।

ग्न के काले तनके
उजले मानव मानवता
बिन तुच्छ हैं।
धी से सब्जी बनती थी
अब सब्जी से घी बनता है।
पहले तो माँ जनती थी
अब सारी पब्लिक जनता है।।

पति की आज्ञाकारिणी थी
यहां अनगिन पतिव्रता नारी ।
आज अनेकों पति हैं
पत्नि के सेवक आज्ञाकारी ।।

घरवाले को फैशनेबिल
लुगाई मार गई।
लिपिस्टिक और पॉडर
की पुताई मार गई।।

बैलबोटम सूट की
सिलाई मार गई।
बच्चों की पढ़ाई ब्याह
सगाई मार गई, इसलिए । ।5।।

आता है अफसोस मुझे
इन कुर्सी के उन मत्तों पर।
आग तो जड़ में लगी हुई
जल छिड़क रहे हैं पत्तों पर।।

ऐसी कोई जगह नहीं है
जहां पर नहीं बेइन्साफी।
सब एक लाइन में खडे हुये
कोई नहीं काबिले है माफी ।।

कुछ तो भूलें अपनी
कुछ पराई मार गई।
गलत फहमी दिलों में
समाई मार गई।।

देहात को चुनाव की
चुनाई मार गई।
शोभाराम प्रेमी को
कविताई मार गई, इसलिए । ।6।।