दयानन्द तो कभी भी दूर दिल से रह नहीं सकते

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दयानन्द तो कभी भी दूर दिल से रह नहीं सकते

तर्ज : ख्यालों में किसी के

दयानन्द तो कभी भी दूर दिल से रह नहीं सकते
जो जाने महिमा ऋषि की वो वयाँ कर नहीं थकते ॥

जमाने में कदम रखे ऋपि ने जब अन्धेरा था
ऋपि के हर वचन में सत्य का उजला सवेरा था
उजाला जो किया है हम अकेले कर नहीं सकते ॥ जो जाने महिमा…

हटाया पाप पाखण्ड को जो फैला था जहाँ भर में
मजहब के नाम पर लड़ते थे और मनमानियाँ करते
ये इक रहवर था ऐसा सैकड़ों मिलकर नहीं बनते ॥ जो जाने महिमा…

हटाया पाप पाखण्ड को जो फैला था जहाँ भर में
मजहब के नाम पर लड़ते थे मनमानियाँ करते
ये इक रहवर था ऐसा सैकड़ों मिलकर नहीं बनते ॥ जो जाने महिमा…

बचाया नारी गी दुःखियों को जुल्मों से छुड़ाकर के
उठाया उनको देकर मान हक ऋषि ने दया भर के
दया के इस चमन का एक फूल उगा नहीं सकते ॥ जो जाने महिमा…

न मरते हैं ऋपि ऐसे जहर से तीर खंजर से
ये वहशत और नफरत मारे वहशी को ही अन्दर से
समर्पित जो प्रभुपर हो गए वो मर नहीं सकते ॥ जो जाने महिमा…

हुई नफरत थी शर्मिंदा धर्म की इस शहादत पर
मैं सदके जाऊँ तेरी पाक और नायाव उल्फत पर

वहाई प्रेम गंगा काश वो हम भी वहा सकते ॥ जो जाने महिमा..

दिखाओ विश्व को आर्यो चमकता सूर्य वेदों का
मिले जो ज्ञान की किरणें भला हो देश देशों का
जहालत में फँसे दुनियाँ गँवाराकर नहीं सकते ॥ जो जाने महिमा…