दामन में आग लगा बैठे
दामन में आग लगा बैठे
सपनों का बाग जला बैठे
तृष्णाओं के दरिया की
धारा बढ़ती ही रही
बढ़ती ही रही,
कुछ दूर चली फिर डूब
गई कागज की नाँव चला बैठे।।
सपनों का बाग जला बैठे।।१।।
हमने अपने ही गुलशन
की हर शाख पे उल्लू
बिठा दिया कोयल के
मधुर स्वरों में जब कागों
का राग मिला बैठे सपनो
का बाग जला बैठे।। २।।
मकड़ी सा जाला बुन
बुनकर फंसते ही रहे
फंसते ही रहे दो कदम
चले फिर उलझ गये
उलझन से हाथ मिला बैठे
सपनो का बाग जला बैठे।। ३।।
जीवन की टेढ़ी-चालों से
क्या पाया सुरेन्द्र चल कर
के शुभाषितो के पत्ते बिखर
गये पावन सा पेड हिला बैठे
सपनों का बाग जला बैठे।।४।।










