बुल बुलों गर तुम्हारा चमन लुट गया
बुल बुलों गर तुम्हारा
चमन लुट गया,
चहचहाने बताओ
कहाँ जाओगे
1-फूलफल न लगेगें
किसी शाख पर आशियाना
बनाने कहां जाओगे
2- हर दिशा में जलन है
पवन में तपन,
पंख पांजे झुलसने लगे
आग से अब कहो
सर छुपाने कहाँ जाओगे।
3- आज पंजाब कश्मीर
तुम्हारा नहीं,
अब असम आंध्र में
भी गुजारा नहीं
झारखण्ड न घुसने देंगे
तुम्हे…….
फिर कहो घर बसाने कहां जाओगे
4- आग तो आग है
ना हुई मन्द है,
बिन कफन जल रहे
आ रही गंध है
बागवां दीखता उनसे
रजामन्द है, दर्द अपना
सुनाने कहाँ जाओगे
5-बात बिगड़ी नहीं
हाँ बिगड़ जायेगी,
तुम संवारों इसे तो
संवर जायेगी हाथ से
वक्त हीरा अगर खो गया,
फिर उसे ढूँढ लाने कहाँ जाओगे
6- यह हमारा चमन,
रंग रंगीला सहन,
हम रहे न रहे,
पर रहेगा वतन
फड़फड़ा कर उठा
जोरे बाजू कहो
फिर इन्हें आजमाने कहाँ जाओगे।
परंविषहते यस्मात्, तस्मात् पुरुष उच्यते।
तमाहुर्व्यर्थ नामानं, स्त्रीवद् य इह जीवति ।।
पुरुष उसको कहते हैं, जो शत्रु का डटकर सामना करता है। जो कायर की तरह डरता हुआ जीता है, उसकी पुरुष संज्ञा व्यर्थ है।










