बिना वेद नहीं मिला भेद उस जगदाधार खिलारी का।
बिना वेद नहीं मिला भेद
उस जगदाधार खिलारी का।
इधर-उधर फिर नाश करे
क्यों मूर्ख आयु सारी का।।
वेदों की मर्यादा छोड़कर
अब तक कष्ट उठाये हैं।
काशी और हरिद्वार, द्वारिका,
मथुरा धक्के खाये हैं।।.
हुई सभ्यता नष्ट उतर के
शिखर से नीचे आये हैं।
कभी आर्य कहलाते थे
पर अब हम कुली कहाये हैं।।
हुआ पतन बिन वेद वतन से
रतन गया सरदारी का। इघर०१
पूर्ण रीति से जिस व्यक्ति ने
वेदों को पहचान लिया।
निराकार अन्तर्यामी को उस
व्यक्ति ने जान लिया।।
राजा और महाराजाओं ने
गुरू उसी को मान लिया।
बिना वेद कल्याण नहीं हो
कभी किसी नर-नारी का।
इधर०२ मैक्समूलर जर्मन से
यहाँ वेद पढ़ने को आया था।
पढ़े वेद फिर गया देश को
वहां प्रकाश फैलाया था।।










