भूल हम सबकी है (धुन- बधे एक डोरी से)
भूल हम सबकी है,
जाने कब-2 की है,
जिसका यह भयंकर परिणाम,
अजी दोषी नहीं हैं गैर,
कहा भी जाता ना रहा भी जाता,
ना कैसे हुए बदनाम ।। टेक ।।
बौद्ध पारसी ना थे ना
मुस्लिम सिक्ख इसाई।
महाभारत से पहले हम
सब थे भाई भाई ।।
गिर गये रे ना रूका,
कीचड़ में फिसला पैर ।। भूल… ।।1।।
बेगानों को अपना समझा
अपनों को बेगाना।।
जाति पांति छुआ छूत में
गुजारा बहुत जमाना।
मिट गये रे हम सदा,
आपस में करके बैर ।। भूल…।।2।।
भ्रातृ भाव इन्सानियत के
भाव दिलों से हट गये।
मजहब की दीवारों में
इस देश के हिस्से बट गये।
डूबेगा रे खेवा भंवरों
में रहा है तैर।। भूल….।।3
सभ्यता संस्कृति गई प्रेमी
सब फैशन में।
दया धर्म और सत्यता
डूबी है अलैक्शन में।।
आया है यह समय
ईश्वर ही करे खैर ।। भूल….।।14










