भवसागर में डोलती नैया के पतवार हैं।

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पाँच सकार (सन्ध्या, स्वाध्याय, सत्संग, संयम, सेवा)

(तर्ज-बच्चो तुम तसवीर हो कल के हिन्दुस्तान की)

भवसागर में डोलती नैया के पतवार हैं।
जीवन सफल बनाने वाले केवल पाँच सकार हैं।
भवसागर में डोलती……

१. सुबह शाम सन्धि वेला में नियमित सन्ध्या करने से।
भक्ति भावना के उपवन में दोनों समय विचरने से।
सुख सम्पत्ति धन वैभव से भर जाते भण्डार हैं।
भवसागर में डोलती……….

२. नित्य करो स्वाध्याय सदा सद्ग्रन्थों को पढ़ते रहना।
ऋषि मुनियों के पदचिह्नों पर दृढ़ता से बढ़ते रहना।
वेद शास्त्र आदि ग्रन्थों के ये अनमोल विचार हैं।
भवसागर में डोलती……

३. अच्छी संगत करो हमेशा यह सत्संग सिखाता है।
सत्पुरुषों की संगत से जीवन कुन्दन बन जाता है।
सत्संग की अमृत वर्षा से धुलते पाप विकार हैं।
भवसागर में डोलती……

४. संयम से काबू में रहते सदा इन्द्रियों के घोड़े।
नर अपने मन की लगाम को ढीला कभी नहीं छोड़े।
घोड़े ही बेकाबु हों तो बच पाना दुशवार है।
भवसागर में डोलती…..

५. सेवा धर्म बड़ा ऊँचा है सब अपने हो जाते हैं।
सेवा करने वाले को ही देव लोग अपनाते हैं।
उस जन जन के सेवक जन से सब जन करते प्यार हैं।
भवसागर में डोलती……

६. जिन्होंने श्रद्धा से इन पाँच सकारों को अपनाया है।
उन्होंने मानव जीवन का सच्चा आनन्द उठाया है।
वही ‘पथिक’ परमेश्वर के वरदानों के हकदार हैं।
भवसागर में डोलती……….