भारत में जड़-पूजा का, घोर अँधेरा छाया था।
भारत में जड़-पूजा का,
घोर अँधेरा छाया था।
टंकारा का देव दयानन्द,
सूरज बनकर आया था।।
सच्चे शिव को उसने ढूँढ़ा,
गंगा की मझधारों में।
दूर हिमालय की चोटी पर,
विन्ध्याचल की धारों में
घोर तपस्या कर दण्डी के,
द्वारे अलख जगाया था।।
भारत में जब जड़ पूजा का घोर……
गौवें कटती, विधवा रोतीं,
देश के वासी सोये थे।
ऋषियों की सन्तान,
रूढ़ियों की उलझन में खोये थे।
सिंहनाद से सच्चे ऋषि ने,
जागृति शंख बजाया था।।
भारत में जब जड़ पूजा का घोर……
वन-वन घूमा, दर-दर भटका,
देश-प्रेम की राहों में।
उसने अपनी मुक्ति देखी,
दीन दुःखी की आहों में।
जन-जन का उद्धार किया,
नव-मुक्ति मार्ग अपनाया था।
भारत में जब जड़ पूजा का घोर……
धर्म चक्र का किया प्रवर्तन,
पावन-गंगा के तट पर।
धर्म दम्भ का ध्वंस किया,
काशी नगरी में मरघट पर।
दिग-दिगन्त भी काँप उठे,
जब ऋषि ने नाद गुँजाया था।
भारत में जब जड़ पूजा का घोर…….










