भारत भयौ गारत आज

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भारत भयौ गारत आज

भारत भयौ गारत आज,
अचम्भौ हरे-हरे अचम्भौ सुनि सजनी।
काहूँ रोग के लिये तम्बाकू
औषधि रची विचारी।
अब तो बिना रोग के घर-घर
में पीवत नर नारी।
कुमति हृदय में ठनी।। भारत० १

सोवत उठत तम्बाकू के
बस फक्क ही फक्क उड़ावें।
खाते पीते चलते फिरते
घूंआ धार मचावें।
बिगड़ गई बुद्धि घनी।। भारत० २

भेड़ चाल चल-चल के
सबने भारत कियौ भिखारी।
सोचत नाहिं नतीजा कोई
दुःख भोगत अति भारी।
करी जैसी करनी।। भारत० ३

सीरा में मक्खी और
चेंटा कोड़ा खूब सड़ा में।
मिला तम्बाकू में इन
सबको अर्क खींच पीजा में।
नहीं जावे बरनी।। भारत ०४

पीने से बल-बुद्धि
घटावें रोगी देह बनाई।
कफ-खाँसी और आलस
आवे नैनन ज्योति घटाई।
कथा में हमने सुनी।। भारत ०५

कोई नशा करौ मति बहिनों
करें पुराणऊ नाहीं।
‘अन्तराम’ हूँ मने करत है
रामायण के माँही।
रा पड़ै विपदा सहनी ।। भारत ०६