महान गौरक्षक, आर्य समाजी संत, शुद्धि आंदोलन के महायौद्धा, अमर बलिदानी, सनातन सेवक, आर्यवीर भगत फूल सिंह जी —-जयंती विशेष

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महान गौरक्षक, आर्य समाजी संत, शुद्धि आंदोलन के महायौद्धा, अमर बलिदानी, सनातन सेवक, आर्यवीर भगत फूल सिंह जी —-जयंती विशेष

24 फरवरी 1885

उत्तर भारत में भगत नाम से प्रसिद्ध फूल सिंह जी का जन्म 24 फरवरी 1885 को हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव माहरा (जुवां) में एक कुलीन जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम चौधरी श्री बाबर सिंह जी मलिक(गठवाला) था और माता का नाम श्रीमती तरादेवी था। उनके पिता के पास पर्याप्त जमीन थी। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि वाले थे। उन्होंने गांव व आस पास के स्कूलों से शिक्षा ग्रहण की और तत्कालीन सरकार में पटवारी लग गए थे। उस समय पटवारी का पद बहुत ही सम्मान वाला होता था।

उनके पिता के पास 100 बीघे से भी ज्यादा जमीन थी। घर पर पर्याप्त सुविधा थी और ऊपर से पटवारी भी लग गए थे। शुरू में भगत जी एक अल्हड़ मौज मस्ती करने वाले युवा थे। वे शराब आदि का भी सेवन करने लगे थे। और लोगो से रिश्वत भी लेने लग गए थे।
लेकिन शीघ्र ही एक गांव में चल रहे आर्य समाजी झलसे में एक सन्यासी से उनकी मुलाकात हुई। झलसे का उन पर बहुत असर हुआ और वे आर्य समाजी बनने को आतुर हो गए।

उन्होंने स्वामी ब्रह्मानन्द जी से यज्ञोपवीत/जनेऊ धारण किया और सब तरह के व्यसन एक झटके में त्याग दिए। उन्होंने लोगो से ली हुई सारी रिश्वत जोड़ी जो कुल पांच हजार रुपये थी। उन्होंने सबके पैसे घर जाकर या पंचायत करके सबके सामने लौटा दिए। और सबसे माफी मांगी।

उनके दो विवाह हुए थे प्रथम श्रीमती लक्ष्मी देवी के साथ जो एक कन्या सुभाषिनी को जन्म देने के पश्चात स्वर्ग सिधार गयी थी। उसके बाद उनका दूसरा विवाह खांडा के दहिया परिवार की बेटी श्रीमती धुपकौर जी से हुआ था। उनसे भी एक और कन्या गुणवती का जन्म हुआ था।

इसके कुछ समय पश्चात ही उन्होंने अपना पूरा जीवन जन कल्याण में लगाने के लिए नौकरी त्याग दी और आर्य सन्यासी बनते हुए वानप्रस्थ ग्रहण कर लिया।

★उन्होंने 23 मार्च 1920 को भैंसवाल कलां गुरुकुल की स्थापना की जिसकी नींव स्वामी श्रद्धानन्द जी ने रखी थी और ज्यादा से ज्यादा युवाओं को शिक्षित करने का काम किया।

★उन्होंने गुरुकुलों के साथ ही गौशालाओं की स्थापना करवाई।

★उन्होंने 1936 में खानपुर में कन्या गुरुकुल का निर्माण किया। इसके लिए उन्होंने अपनी सारी जमीन और सम्पति लगा दी थी। और कन्या शिक्षा की एक मुहिम चला दी थी। यह गुरुकुल आज एक यूनिवर्सिटी का रूप धारण कर चुका है।

★उन्होंने 1916 में समालखां में ब्रिटिश सरकार का बूचड़खाना खुलने से पहले ही अनशन करके बन्द करवा दिया।

★इन्होंने 1937-38 में लाहौर में भी गौहत्या के लिए खुलने वाले बूचड़खाने को बन्द करने में भी विशेष योगदान दिया।चौधरी छोटूराम जी ने भी इसमे योगदान दिया था।

★उन्होंने कई गांवों में लोगो को समझाकर गांव के बाहर गौचारण हेतु भूमि छुड़वाने का कार्य भी किया।

★भगत जी जातिवाद के बहुत खिलाफ थे उन्होंने दलितों के उद्धार के लिए भी अनेक कार्य किये थे। मोठ गांव में मुसलमान वहां के दलितों को कुआं नहीं बनाने दे रहे थे। तो भगत जी ने वहां जाकर अनशन शुरू कर दिया। ब्रिटिश प्रशासन भी मुस्लिमो के ही पक्ष में था। राँघड़ो ने उन पर हमला करके उन्हें जंगल मे फेंक दिया लेकिन वे घायल अवस्था मे ही फिर से आकर बैठ गए। जब यह बात चौधरी छोटूराम जी तक पहुंची तो वे झट से वहां आये और प्रशासन को हिला दिया। अंत मे वहां कुआं बना और उसी का पानी पीकर ही कुल 23 दिन बाद भगत जी ने अनशन तोड़ा।
इसी तरह उन्होंने नारनौंद में भी 19 दिन तक उपवास धारण करके दलितों के लिए कुआं बनवाने का कार्य किया।

★1928 में होडल एवं पलवल में उन्होंने शुद्धि की लहर चलाई और अनेक मुस्लिमो को पुनः हिन्दू बनाया। इसमे वहां का केके जैलदार बाधा डाल रहा था तो उन्होंने सत्याग्रह कर दिया और यह उपवास कुल ग्यारह दिन तक चला। तब चौधरी छोटूराम जी वहां पहुंचे और उन्होंने उनका अनशन तुड़वाया और प्रशासन की ओर से हो रही दिक्कतों को दूर करवा दिया।

★उन्हें सत्याग्रह करने के कारण भारत का देहाती गांधी भी कहा जाता है।

★उन्होंने 1929 में रायपुर गांव में भी एक मुस्लिम परिवार को शुद्धि करवाकर पुनः हिन्दू बनाया।
★परनाला गांव में भी उन्होंने एक परिवार को शुद्धि करके पुनः वैदिक धर्म मे सम्मिलित करवाया।

★1939 के हैदराबाद सत्याग्रह में उनका तन मन एवं धन से विशेष योगदान रहा। यहां उन्होंने हजारों की संख्या का एक बहुत बड़ा जत्था तैयार करके हैदराबाद भेजा। उनके झलसे पर यहां के कट्टर मुस्लिमो ने आक्रमण भी कर दिया था। उन्हें चोट आई लेकिन वे डिगे नहीं और प्रचार जारी रखा।

★1941 में उन्होंने लोहारू के नवाब के विरुद्ध भी स्वामी स्वतंत्रतानन्द जी महाराज के साथ गए। जहां सभा मे मुस्लिमो ने आक्रमण कर दिया। इसमें भगत जी बुरी तरह से घायल हुए थे। परंतु उन्होंने संघर्ष जारी रखा।

★उन्होंने हरियाणा एवं आस पास में शुद्धि आंदोलन को एक विशेष प्रगति प्रदान की और ईसाई एवं मुस्लिम बन चुके कई लोगो को फिर से सनातन धर्म मे दीक्षित करवाया।

★उनके इन कार्यो से परेशान होकर 14 अगस्त 1942 को पांच मुस्लिमो ने सैनिकों का वेष धारण करके उन पर हमला कर दिया और गोलियों से उनकी हत्या कर दी।

इस तरह सनातन धर्म का एक महान संत गौरक्षा एवं धर्म की सेवा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

भगत जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन आर्य समाज, गौरक्षा, शिक्षा के प्रसार एवं सनातन धर्म की सेवा में बिता दिया। आज उनकी जयंती पर हम उनके चरणों मे कोटि कोटि प्रणाम करते हैं।