अरे मन जो तेरा यूंही मन माना जायेगा

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अरे मन जो तेरा यूंही मन माना जायेगा

अरे मन जो तेरा यूंही मन माना जायेगा
कर्मो का
अपने बेशक जुर्माना पायेगा

इस मन छलिये का क्यों प्यारे
साथ निभाये जाते हो अपनी
हस्ती भूल इसे क्यों सिर पें
चढाये जाते हो अब रोकँगा
कल रोकूंगा कहते जीवन
बीत रहा यूँ कहते कहते
इसको समझाना पायेगा ॥१॥

पाप कर्म की बेल चढी जो
उतार सके उसको उतार दया
धर्म का मूल बताया जिने का
सबको अधिकार ‘मारता है
क्यों मूर्गे बकरे मार सके तो
मन को मार सोच तेरा भी
यम से परवाना आयेगा ।।२।।

देख गरिबो के बच्चे को आँख
चुराये जाते होगी मगर तमाशे
शराब के अन्दर धन को लुटाये
जाते हो मानवता से आँख मिचौली
जीवन का दस्तूर नही ये नर तत्त तू
सुरेन्द्र सदा ना पायेगा ।।३।।