एष स्य ते मधुना इन्द्र सोमो । वृषा वृष्णः परि पवित्रे अक्षाः ॥
सहस्त्र दाः शतदा भूरिदावा । शश्वत्तम बर्हिरावाज्यस्थात्
साम. ५३१, ऋ. ६.८६.४
तर्ज: हवा में मन डोले
फागुन मन डोले मचलकर बोले
होली है सोमरस की आनन्द क्यों ना घोले
हवाएँ और नदी नाले खड़े पिचकारियाँ भर के(2)
पेड़ फल फूल पौधे पत्ते खेलें फाग और हरखें
घटाएँ काली काली बरसने वाली
धरा पे हौले हौले ॥ होली है…
जो आना है तो आ जाओ भरी पिचकारियाँ लेकर (2)
बहारें बन के बरसेंगी ये बून्दनियाँ आनन्द देकर
है लम्बी पिचकारी तो खेलेंगे खिलाड़ी
तू साथियों का हो ले ॥ फागुन ॥
सांसारिक खेल तो सम्पत्ति वाले खेल सकते हैं
खुले हाथों से अन्न बल ज्ञान दे के दानी बनते हैं
दे दान की होली ना देके कभी तोली
हृदय को रखें खोले ॥ फागुन ॥
तू नन्दन वन में होगा जब हृदय सूखा खिलेगा तब
अनन्त वसन्त ही वसन्त रहेगी हरियाली अनवरत
भला जो करे दानी दे तृप्ति कल्याणी
स्वयं भी तृप्त हो लें ॥ फागुन ॥
मिली इक यज्ञ की कौड़ी, न अरबों रुपयों से थोड़ी
सांसारिक यज्ञ है विस्तृत, है जैसे विस्तृत अम्बोधि
बना ले दिल दरिया न व्यर्थ बीते घड़ियाँ
हे इन्द्रः याज्ञिक हो ले ॥ होली है ॥










