ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
यज्ञ भावनाएँ जागीं, लहरें उठीं
मिश्री-शहद हुए फीके
जब मन में श्रद्धा जगीं
ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
उच्च शिखर पर हृदय की
भावुक लहरियाँ जा पहुँचीं
पराकाष्ठा चेतना की
हृदयाकाश में जा फैलीं
कितनी नशीली हैं लहरें
इन्द्र तू इसमें जा बह ले
इस देह की अयोध्या में
इन्द्रिय-कलश का सोम पी
यज्ञ भावनाएँ जागीं, लहरें उठीं
ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
इन्द्रिय कलश ये तो बरबस
दिखते हैं सूखे काठ से
किन्तु श्रद्धा का रस परिपूर्ण
भर दिया जब भी इस पात्र में
पात्र घृत-रस से बना चिकना
लाज़िम है इस रस का टिकना
सोमरस होता है घृत-सम
ये स्निग्धता ही है निरति
यज्ञ भावनाएँ जागीं, लहरें उठीं
ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
ये मेरे नेत्र, कर्ण, जिह्वा
सोम की बाट जोह रहे
रोम रोमांचित स्नेहित प्राण
स्नेह भरी दृष्टि पोस रहे
सोमरस चमको बरसो
बीते कई अरसों बरसों
खड़े हम प्रतीक्षा में “मोहन”
कब से ये आखें हैं तरसी
यज्ञ भावनाएँ जागीं, लहरें उठीं
ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
मधुमय नशीली ऋतवती लहरों से
भर दो सबका मन
ओढ़ के आओ तुम ओढ़नी
हर्षित तरंगों की “मोहन” !
काठ-कटोरों में आओ
प्यासी आत्मा को सरसाओ
प्रेम-सनी प्याली आत्मा के
होठों पर रख दो एक घड़ी
यज्ञ भावनाएँ जागीं, लहरें उठीं
ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
ऐ मेरे मन-“मोहन”, मधुरस तू पी
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई










