अहो अन्ध मूरख ! तू कैसा है सोया।
अहो अन्ध मूरख ! तू कैसा है सोया।
अमोलक समय तूने सोते ही खोया ।।१।।
न आँखे ही खोली न करवट ही बदली।
न दर्पण ही देखा न मुखड़ा ही धोया।।२।।
गर्भाशय का भी न समझा तू आशय।
कि किन किन कर्मों का यह दण्ड होया ।।३।।
पहिना था जामा मनुष्य जन्म का।
पापों के कीचड़ में तूने डूबोया ।।४।।
भूषण की शोभा को क्या जाने गन्धर्व।
गले में तेरे कैसे माणिक पिरोया।।५।।
‘अमीचन्द’ बालक जन्मता है रोया।
चलते समय भी यही रोना रोया ।। ६ ।।










