आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु

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आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु

अनुष्टुप् छन्दः

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।।
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।। (कठो. १-३-३, ४)


भावार्थ- आत्मा रथ का स्वामी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है, मन लगाम है, इन्द्रियां घोड़े हैं, और रूपादि विषय इन्द्रियों के मार्ग हैं। जब आत्मा-मन तथा इन्द्रियों के साथ संयुक्त होकर विषयों का सुखपूर्वक सेवन करता है, तब ‘भोक्ता’ होता है, ऐसा विद्वान् लोग बताते हैं।