आओ! सन्सार के प्रिय मानवो
आओ! सन्सार के प्रिय मानवो
मिल जुल के मित्र बन जाएँ
आपस में भुला दें वैर और द्वेष
प्रभु गोद में बैठ खिल जाएँ
गुंजा दें प्रभु-महिमा के गीत
ऊँचे-ऊँचे मधु-स्वर से
कर दें आकाश पाताल को एक
जो ओ३म् के नाम से भर जाए
जो परमपिता है परिपावन
आँचल उसका थामे तर जाएँ
मिल जुल कर मित्र बन जाएँ
नई ज्योति जगत् में जागृत हुई
जहाँ प्रभु की सत्ता का हुआ अनुभव
व्याकुल आत्मा अपने प्यारे पिता के
सन्स्पर्ष से हुआ अभिनव
आध्यात्मिक जन्म हुआ आत्मा का
अब याज्ञिक भाव समा जाएँ
मिल जुल कर मित्र बन जाएँ
ईर्ष्या द्वेष वैर वृत्ति मिट गई
भोले बालक के सखा हो गए
हर मानव मित्र बना उसका
पेड़ पशु पक्षी पौधे सखा हो गए
इन सब से मिलजुल कर ईश्वर के
महिमा गीत गुंजा जायें
मिल जुल कर मित्र बन जाएँ
आत्मिक अनुभूति ने स्नात किया
निष्कामता ने आत्मसात किया
इस सन्त सरल शान्त हृदय ने
आध्यात्मिक यज्ञ का न्यास किया
इसे सन्त वृद्ध बालक का नाम मिला
ऐसे में प्रभु प्रेम क्यों ना पाएँ ?
मिल जुल कर मित्र बन जाएँ
निर्वैरता में है बरु बालक
और विद्या में बन गया ज्ञानवृद्ध
मनोवृत्तियाँ बन गई यज्ञमय
बालोपम की सरलता हो गई सिद्ध
जगमग जागृत जाज्वल्य जीवन
मित्रभाव को जग में फैलाएँ
मिल जुल कर मित्र बन जाएँ










