आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
उनमें लवलेश भी मलिनता नहीं
इन्द्र प्रभु तो परम शुद्ध पवमान हैं
साम-गान के द्वारा करें भक्ति
आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
उनमें लवलेश भी मलिनता नहीं
अक्षर, मात्रा, छंद, तान, आरोह, अवरोह
सब दृष्टि से होवे प्रभु से संयोग
सुन के शुद्ध संगीत की लहरियाँ
आविर्भूत हृदय में होंगे अधिपति
आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
उनमें लवलेश भी मलिनता नहीं
आनन्द लेते हुए सङ्ग छेड़ेंगे तान
युगल संगीत लहरियाँ समा देंगी बाँध
यह तरंगित हृदय होगा संतृप्त शान्त
स्वरचित गद्य-पद्य भी देंगे खुशी
आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
उनमें लवलेश भी मलिनता नहीं
गीत-रचना के सङ्ग होवे भाव विशुद्ध
सुन के प्यारे प्रभु जी करेंगे प्रबुद्ध
प्रभु के आशीष खिलाएँगे प्रेम-सुमन
और देंगे हमें वह सुख संसृति
आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
उनमें लवलेश भी मलिनता नहीं
भाग्यशाली श्रेणी में तुम लाओ हमें
तेरे प्रेम की दृढ़ डोर ही में बंधें
तेरी आनन्द धाराओं में बहें
चहुं ओर से कर दो आह्लादित स्थिति
आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
उनमें लवलेश भी मलिनता नहीं
इन्द्र प्रभु तो परम शुद्ध पवमान हैं
साम-गान के द्वारा करें भक्ति
आओ राजराजेश्वर की कर लें स्तुति
उनमें लवलेश भी मलिनता नहीं
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * २३.२.२०२२ ९.३० रात्रि
राग :- मांड (राजस्थानी गायनों में प्रसिद्ध)
गायन समय रात्रि का द्वितीय प्रहर, ताल दादरा ६ मात्रा
शीर्षक :- आशीर्वाद का प्रसाद
वैदिक भजन ८८५ वां
*तर्ज :- *
0232-832
लवलेश = थोड़ा सा, नाम मात्र
पवमान = अत्यन्त पवित्र
संयोग = मिलना
आविर्भूत = सामने आया हुआ
संतृप्त = पूरी तरह से तृप्त
प्रेम-सुमन = प्रेम से भरा सुन्दर मन
प्रबुद्ध = जागृत
संसृति = प्रवाह
आह्लादित = अत्यन्त प्रसन्न
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
आशीर्वाद का प्रसाद
आओ हम राजराजेश्वर इन्द्र प्रभु की स्तुति करें। इन्द्र प्रभु परम शुद्ध और पवित्र हैं। उनमें कहीं मलिनता का लव लेश भी नहीं है। अतः उनकी स्तुति के लिए पूर्णता शुद्ध साम- संगीत ही चाहिए।अक्षर, मात्रा, छंद, तान, आरोह,अवरोह सब दृष्टियों से शुद्ध पूत साम के द्वारा शुद्ध प्रभु की अर्चना हम करें। हमारे शुद्ध संगीत की लहरियां निश्चित ही उन्हें हमारी ओर आकृष्ट कर लाएंगी। वे हमारे हृदय में आविर्भूत होकर हमारे संगीत में आनन्द लेते हुए अपने संगीत की भी तान छेड़ देंगे। हमारी और उनकी संगीत लहरियां मिलकर एक अद्भुत समा बांध देंगी, जिससे तरंगित हुआ हमारा हृदय एक अपूर्व संतृप्ति का अनुभव करेगा। शुद्ध साम- गायन के अतिरिक्त हम स्वरचित गद्य और पद्य में स्तोत्रों(उक्थों) के द्वारा भी इन्द्र परमेश्वर का स्तुति गान करें। वह भी रचना और भाव दोनों दृष्टियों से पूर्ण परिशुद्ध होने चाहिएं, जिससे शुद्ध प्रभु के हृदय को स्पर्श कर सकें। पूर्ण समर्पण भाव से दान किए गए शुद्ध साम और शुद्ध उक्थों से शुद्ध प्रभु रीझते हैं, और स्तोता की संवृद्धि करते हैं, स्तोता के ही उत्कर्ष को बढ़ाते हैं, स्तोता को ही सब दृष्टि से समुन्नत करते हैं। स्तोता को शुद्ध प्रभु के शुद्ध आशीर्वाद का प्रसाद प्राप्त होता है। आशीर्वाद से बढ़कर अन्य कोई वस्तु इस जगतीतल में नहीं है और वह आशीर्वाद का प्रसाद यदि प्रभु का है तब तो वह और भी अमूल्य है, क्योंकि वह कभी असत्य नहीं हो सकता, वह सदा सफल ही होता है। प्रभु के आशीर्वाद में वह बल है जो अज्ञानी को ज्ञानवान, अकर्मण्य को कर्मण्य, पापी को पुण्यात्मा और पतित को सर्वोन्नत कर सकता है। अतः आप, हम भी स्वयं को उन भाग्यशालीयों की श्रेणी में लाएं, जिन्हें प्रभु के आशीर्वाद का प्रसाद प्राप्त होता है। अपने हृदय से आशीर्वाद की पवित्र धाराएं बहाते हुए शुद्ध प्रभु हमें आह्लादित और आनन्दमग्न करें।
🎧885वां वैदिक भजन🕉👏🏽










