आज समर्पण का दर्पण तो टूट के चकनाचूर हुआ।
आज समर्पण का दर्पण तो
टूट के चकनाचूर हुआ।
इसीलिए तो आज का
मानव मानवता से दूर हुआ॥ टेक ॥
अमन शान्ति के बदले
बन्दूकें आग उगलती हैं।
अस्त्र शस्त्रों के द्वारा क्या
उत्पन्न बाधायें टलती हैं।
ईश्वर धर्म के नाम के
ऊपर यहां दुकानें चलती हैं।
जहां भी देखो दुखी का
शोषण दाल झूठ की गलती है।
स्वतन्त्रता की फलती बेल
का हर खट्टा अंगूर हुआ ॥1॥
आराम और धन ऐश्वर्य बना
लक्ष है जिनके जीवन का।
राष्ट्र का शत्रु समझो उनको
खून चूस रहे निर्धन का॥
करोड़ों को भूखा मारें
व्यापार करें काले धन का।
मनुशास्त्र के बिना इलाज
नहीं है इस पागलपन का॥
उग्रवाद आतंक यही इन्सान
जो इतना क्रूर हुआ॥2॥
जो विरक्त बनकर निकले
थे वे अनुरक्त बने बैठे।
धन वैभव के भण्डारों
पर हो सशक्त बने बैठे॥
धन से मोक्ष प्राप्त करवाते
योगी सन्त बने बैठे।
देश के घातक धर्म के
दुश्मन बगुले भक्त बने बैठे॥
वैराग्य बिना इन सन्तों का
तो मुख मण्डल बेनूर हुआ॥3॥
कीचड़ में कमल दीपक से
काजल बनता है सब जानते हैं।
अच्छों के बुरे, बुरों के अच्छे
पैदा हो जाते मानते हैं।
कर्तव्य परायणता और
धर्म का जो स्रूप पहिचानते हैं।
उनमें ही समर्पण भावना अपने
राष्ट्र पै मिटना ठानते हैं।।
मनन करो कुछ इस पर कर्मठ
लिखने को मजबूर हुआ॥4॥










