आज अविद्या अन्धकार में भटक रहा है जग सारा

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आज अविद्या अन्धकार में भटक रहा है जग सारा

आज अविद्या अन्धकार में
भटक रहा है जग सारा,
गुरुडम का बज रहा इकतारा।
अज्ञान फैलता जाता है
इन झूठे मत पन्थों द्वारा,
कुछ किये बिना नहीं निस्तारा ॥

नाश अविद्या का करना है
वचन ऋषि को दे बैठे।
विद्या की वृद्धि करने को
दिल में लिए सन्देह बैठे॥
वो अमृत को तज बैठे,
जल सागर का पी रहे खारा ॥1॥

ऋषि दयानन्द के सैनिक
बनकर के हौंसले पस्त हैं क्यों
आपके होते हुए वेद के
ज्ञान का सूर्य अस्त है क्यों॥
गये भूल लगाना गश्त है क्यों,
चोरों ने कुम्बलकर डारा॥2॥

सत्यार्थ प्रकाश की चौदह
गोलों वाली तोप लिए बैठे।
फिर भी उन पाखण्डियों का
क्यों दिलमें खौफ किये बैठे॥
घर में सन्तोष किये बैठे,
दयानन्द का बोल के जयकारा ॥3॥

गांव-गांव और नगर-नगर में
गुरुडम के लग रहे मेले।
नाम दान की भीड़ लगी है
बना रहे चेली चेले ॥
यहां कागजी घोड़ों से खेलें,
कर्तव्य से पा लिया छुटकारा ॥4॥

आर्य वानप्रस्थी संन्यासी
जितने भी हैं ब्रह्मचारी।
वेद प्रचार को निकले अपनी
समझ के कुछ जिम्मेदारी॥
जितने भी आर्य नर नारी
जाओ वैदिक धर्म जो है प्यारा ॥5॥

बड़े पार्क मैदानों में कथा
उत्सव के आयोजन हो।
समय और धन का व्यय
होता कुछ तो सिद्ध प्रयोजन हो॥
कर्मठ सफल परिक्षण हो
जो सेवा व्रत मनमें धारा ॥6॥
गुरुडम का बज रहा इकतारा ॥