जागृति मेरी जब से हुई है पाप हुए हैं परिहारी
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी
देह-पुरी बनी जीवन-निवासक
सत्य-सुमत सांद्रकारी
सत्य, सत्य सुमत साद्रकारी
अणु-अणु देह का कर दो याज्ञिक
हे ब्राह्मण ! यज्ञ कराओ
ब्रह्मा बन जाओ इस अध्वर यज्ञ के
जीवन अधिष्ठाता कहलाओ
विप्र-वृत्ति, परोपकारी बीजों से
लहरे जीवन वृक्ष-डाली
डाली, लहरे जीवन वृक्ष-डाली
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी
क्रिया-कलाप यज्ञों का हो सात्विक
तव सत्ता की हो मिठास
ज्ञान, कर्म, प्रेम, श्रद्धा भावों का
होवे परार्थ-प्रभास
हे ‘अंगिरस्तम’ प्राणों के प्राण
यज्ञ हो परिपूर्ण अघारी
अघारी, यज्ञ हो परिपूर्ण अघारी
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी
बिन आत्मबोध के जीवन है नीरस
आत्मभूति तो है सक्षम
आत्मभूति से देह-पुरी में
चहल-पहल हो विक्रम
यज्ञ सफल करो देवों के देव
यजमान होवें मनोहरी
मनोहरी, यजमान होवें मनोहारी
जागृति मेरी जब से हुई है
पाप हुए हैं परिहारी
पाप, पाप हुए हैं परिहारी
देह-पुरी बनी जीवन-निवासक
सत्य-सुमत सांद्रकारी
सत्य, सत्य सुमत साद्रकारी
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * ६.४.२०२० १२.२५ मध्यान्ह
राग :- बिहाग
गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, रात्रि ९ से ११, ताल दादरा ६ मात्रा
शीर्षक :- सरस यज्ञ
वैदिक भजन ८८४ वां, आज भाग १ कल भाग २
*तर्ज :- *
0231-0232
शब्दार्थ:-
परिहारी = छोड़ने,वाला हटाने वाला
निवासक = रहने वाला निवास करने वाला
सुमत = बुद्धिमान, सयाना
सांद्रकारी = बल बढ़ाने वाला
अध्वर = अबाध, हिंसा रहित
अधिष्ठाता = नियामक देखभाल करने वाला
विप्र = धार्मिक विद्वान सन्यासी आदि
परार्थ = दूसरे का कल्याण
प्रभास = उज्जवल, चमक
सक्षम = समर्थवान
विक्रम = शक्ति की अधिकता
मनोहारी = मन को प्रसन्न करने वाला
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
सरस यज्ञ
मेरी जान! तुम जब से जगी हो। मेरे पाप नष्ट हो गए हैं मैं अपने अंग-अंग में एक पवित्रता सी अनुभव करता हूं। मेरी देह- पुरी अब तुम्हारा ठिकाना बनी है, तब से इसमें आप की प्रवृत्ति का अभाव सा हो गया है। पहले भी तुम थी, पर सोई हुई। जब से इस पूरी के देवों को तुम्हारे जाग उठने का ज्ञान हुआ है, वे सावधान हो गए हैं। उन्हें बोध हो गया है कि वे इंद्र के हैं– आत्मा के। इन्द्र निर्मल है, स्वच्छ है। इसलिए उसके गण भी स्वच्छ है निर्मल हैं।
तुम्हारी सत्ता की अनुभूति से मेरे अंग-अंग में, होठों पर रोमांच की अवस्था रहती है।
प्यारा मेरे अपने अन्दर है–यह सोचते ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, प्यार की एक लहर सी मेरी नस- नस नाड़ी -नाड़ी में दौड़ जाती है। इस अनुभूति का वर्णन में किन शब्दों में करूं?
मेरे आत्मा ! मेरे प्राणों के प्राण ! मेरे अंग- अंग के रस ! क्या तुम ब्राह्मण हो–ब्रह्मपुत्र? प्रभु के अमृत सुत? तुम संपूर्ण देह के लिए समर्पित हो। देह-पुरी के देवों का संपूर्णानंद तुम्हारी सरस सत्ता के कारण है। तुम वास्तव में ब्राह्मण हो।
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! हम यज्ञ करने लगे हैं। मेरे शरीर का एक-एक अंग यज्ञ में प्रवृत्त होने लगा है। तुम इस यज्ञ के ब्रह्मा हो। इसे जीवन अनुष्ठान के अधिष्ठाता बनो। अपनी विप्र-वृत्ति से इसमें परोपकार का बीज बो दो। इस जीवन वृक्ष को सरसा दो। लहरा दो। इसमें रस भर दो। हमारा यज्ञ सूखा क्रिया-कलाप ना रहे। इसमें तुम्हारी सत्ता का मिठास हो। आत्मवान यज्ञ, सच्चे मेधावी विप्र का यज्ञ, अंगिरस्तम का यज्ञ यांत्रिक नहीं, ज्ञान से, भावना से, प्रेम से और श्रद्धा से परिपूर्ण होगा।
आत्मबोध के बिना तो जीवन नीरस ही था। जब से आत्मा की अनुभूति हुई है, मानो घर वाला आ गया है। उसके आते ही संपूर्ण घर में चहल-पहल है। खुशी है। मंगल है। स्वागत के समारोह हो रहे हैं। यज्ञ के समारम्भ होने लगे हैं। संपूर्ण इन्द्रियां यजमान बन रही हैं। देवों के देव। आओ। आसन लो। यज्ञ को सफल करो, सरस करो। अपने यजमान ओं को अपने शुभ आगमन से निहाल कर दो।
इति ८८४वां भजन
🎧884B वां वैदिक भजन🕉👏🏽










