इस जीवन के चौराहे पर कितनों से मेल मिलाप हुआ

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इस जीवन के चौराहे पर कितनों से मेल मिलाप हुआ

इस जीवन के चौराहे पर
कितनों से मेल मिलाप हुआ
कितनों से मिले मजबूरी में
कितनों से अपने आप हुआ

कुछ से मिल के तो खुशी हुई
कुछ से मिल सन्ताप हुआ
जिनसे मिलना था उनसे मिल न सके
इसी लिए तो पश्चाताप हुआ (1)

प्रभु मेरे जीवन को जीना सिखा दो
गमों को खुशी से पीना सिखा दो (2)

तन ये प्रभु जी तुम्हारा शिवाला
धधगती हृदय में तुम्हारी ही ज्वाला
ज्वाला को भक्ति का प्याला पिला दो
गमों को खुशी से पीना सिखा दो
प्रभु मेरे जीवन को जीना सिखा दो
गमों को खुशी से पीना सिखा दो

मन को न घेरे – विकारों की बातें
सदा ही चलें – संस्कारों की बातें
संस्कारों का ऐसा दर्पण दिखा दो
गमों को खुशी से पीना सिखा दो
प्रभु मेरे जीवन को जीना सिखा दो
गमों को खुशी से पीना सिखा दो

सत्संग में मन को – अपने लगाऊँ
तेरी कृपाओं का गुणगान गाऊँ
“विजय” प्रेम से मन का दीपक जला दो
गमों को खुशी से पीना सिखा दो
प्रभु मेरे जीवन को जीना सिखा दो
गमों को खुशी से पीना सिखा दो

स्वर :- श्री सन्दीप जी गिल*

इसी लिए तो पश्चाताप हुआ (1) :– प्रार्थना से पश्चाताप होता है और आगे को पाप-वासना का बल घटता जाता है |

(महर्षि दयानन्द सरस्वती, दूसरा उपदेश – पूना, उपदेश मंजरी, सम्पादन – विश्वप्रिय वेदानुरागी)

गमों को खुशी से पीना सिखा दो (2) :– शीत से आतुर पुरुष का अग्नि के पास जाने से शीत निवृत्त हो जाता है वैसे परमेश्वर के समीप प्राप्त होने से सब दोष दुःख छूट कर परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव के सदृश जीवात्मा के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हो जाते हैं, इसलिये परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना अवश्य करनी चाहिये। इस से इस का फल पृथक् होगा परन्तु आत्मा का बल इतना बढ़ेगा, कि पर्वत के समान दुःख प्राप्त होने पर भी न घबरायेगा और सब को सहन कर सकेगा।
सत्यार्थ प्रकाश, महर्षि दयानन्द जी रचित, सप्तम् समुल्लास, सम्पादन – विश्वप्रिय वेदानुरागी