हे जीवन-ज्योति अग्ने ! तुझमें ही समा जाएँ
हे जीवन-ज्योति अग्ने !
तुझमें ही समा जाएँ
शुभकामनाएँ मन की
तव कृपा से आ जाए
कर्तव्य-बुद्धि प्रभु दे दो
अग्नि-समान हो जाएँ
करुणा की आग पा जाएँ
हे जीवन-ज्योति अग्ने !
तुझमें ही समा जाएँ
हम देवत्व उपासक होवे
देव है सच्चे खिलाड़ी
हार जीत में दिल ना हारते
ना ही वह दिखाते लाचारी
निर्लेप बुद्धि है उनकी निष्काम
कर्म है चारु ज्योतिर्मय हैं जो कारु
हे जीवन-ज्योति अग्ने !
तुझमें ही समा जाएँ
शुभकामनाएँ मन की
तव कृपा से आ जाए
ऐसे महान मनुष्य-हृदय को
अग्निदेव जगाते
देवत्व की ओर जो मानव
अपना एक पग हैं बढ़ाते
सौ सौ कदम बढ़ा के देवता
पसारते अपनी कृपामय बाहें
हे जीवन-ज्योति अग्ने !
तुझमें ही समा जाएँ
शुभकामनाएँ मन की
तव कृपा से आ जाए
हे मेरे जीवन की ज्योति !
पास नहीं कुछ मेरे
प्राणों की धौंकनी-धौंकता
लेता तिनके कुछ तेरे
यूँ तो कुशा सारा सन्सार है
पर मेरी हैसियत यही ‘दो तिनके’
हे जीवन-ज्योति अग्ने !
तुझमें ही समा जाएँ
शुभकामनाएँ मन की
तव कृपा से आ जाए
कर्तव्य-बुद्धि प्रभु दे दो
अग्नि-समान हो जाएँ
करुणा की आग पा जाएँ
हे जीवन-ज्योति अग्ने !
तुझमें ही समा जाएँ
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– *
राग :- नंद कल्याण
कर्नाटक संगीत में राग कल्याणी,
गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा
शीर्षक :- दो तिनके
वैदिक भजन ४९३A वां
*तर्ज :- *
836-0237
शब्दार्थ :-
निर्लेप = जो लिप्त ना हो
चारु = सुंदर, मनमोहक
कारु = निर्माण करने वाला
धौंकनी = आग की फूंकी
कुशा = घास
हैसियत = शक्ति या योग्यता
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
दो तिनके
यज्ञ की आग कृपा की, करुणा की आग है। इस आग को वही लोग जला सकते हैं, जो वास्तव में महान हैं, जिनके हृदय महान हैं जो संकोच से ऊपर, हिचकिचाहट से पार हो चुके हैं, जो उपकार करते हैं परंतु केवल कर्तव्य-बुद्धि से।
ऐसे ही मनुष्य देवताओं के उपासक हो सकते हैं। देवता खिलाड़ी होता है। खिलाड़ी चाहे जीत जाए चाहे हार जाए उसकी हमेशा जीत होती है। उसका हृदय कभी नहीं हारता लीला निष्काम कर्म का कैसा सुन्दर रूप है! लीला सदा निर्लेप की बुद्धि से की जाती है। दो पहलवान अभी लड़ रहे हैं,एक दूसरे को गिराने का भरसक प्रयत्न कर रहे हैं। परंतु ज्यों ही एक ने दूसरे को चित गिरा दिया लीला समाप्त हुई। जो अभी एक दूसरे के जानलेवा थे अब परस्पर आलिंगन की क्रीडा कर रहे हैं। कोई वैर नहीं विरोध नहीं यही देव वृति है।
मेरे जीवन की ज्योति! मेरे पास और कुछ नहीं। कभी-कभी तुम्हारी कृपा से तुम्हारे कमनीय रूप की झांकी सी मिल जाती है। मेरे मन में कामना उठती है कि तुम्हारा आवाहन करूं। थोड़े से तिनके लेता हूं और अपने प्राणों की धौकनी से उन्हें धौकने लगता हूं। यों तो सारा संसार ही कुशा के– घास के–सिवाय और कुछ नहीं है। पर मेरे शरीर की हैसियत तो दो-तिनकों से अधिक कुछ भी नहीं। कवि के कथन अनुसार–
है चार दिनका मेरा तिनकों का आशियाना
आज इन्हीं तिनकों को फूंकने की सोची है। प्रभु !क्या यह फुंक सकते हैं? हां! यदि इनमें तुम्हारी तेज की एक चिंगारी आ जाए। पर वह आए कहां से? जब तक तुम कृपा ना करो मेरे सर्वमेध की सफलता असंभव है। तुम यज्ञ- स्वरूप हो ।महनीय- महिमा हो। तुम ही में मेरे इस यज्ञ के संकल्प को सिद्धि का रास्ता दिखा दो। अग्निदेव!क्या यह सच है कि तुम रेशम के, ऊन के, बहुमूल्य आसनों पर विराजमान नहीं होते हो? तुम्हें सिहासनों से,चौकियों से, कुर्सियों से, सोफों से प्रेम नहीं है? तुम्हें केवल कुशा प्यारी लगती है जो सर्वत्र प्राप्त हो जाती है? कुशाल लक्षण है त्याग का, तपस्या का, धन रहित अध्ययन का। क्या तुम त्याग में, तपस्या में, निर्धन अध्ययन ही में प्रकट होते हो? तो आओ !तुम्हारे लिए मैंने दर्भ ही का आसन बिछाया है, कटीले धर्म का। इस कंटीली कुशा की कठोर तपस्या स्वीकार करो,स्वीकार करो। तुम्हारी ज़रा सी झांकी मिल जाने से इसका मुख उज्जवल हो जाएगा। तपोमूर्ति ब्राह्मण तुम्हारे तेज से तेजोमय हो जाएगा। इस तपस्वी के पास दो-तीनकों के सिवाय और है भी क्या! फिर आज तो यह इन्हें भी स्वाहा कर देने को खड़ा है। यह पक्का ‘देवयु’ बन गया है। तुमसे इसे यही दो तीन के जुदा कर रहे प्रतीत होते हैं।तो आज यह इन्हें भी तुम्हारी भेंट करता है!
अग्निदेव क्या तुम अब भी प्रसन्न न होंगे? सर्वस्व स्वाहा करने पर भी यदि तुम्हें दया नहीं आती तो तुम्हारी कृपालुता एक मृग मरीचिका सी है। तुम महान नहीं हो मर्डन शील नहीं हो । भक्त तुम से अधिक महान है!










