सभी सुखों से युक्त मनुष्य जो, उसको सभी महान कहें।
सभी सुखों से युक्त मनुष्य जो,
उसको सभी महान कहें।
संपत्ति से परिपूर्ण जो,
उसको कृपानिधान कहें।
जिसके यश की गाथा निश दिन,
ज्ञानी और नादान कहें।
“धर्मी”और बैरागी को भी,
ज्ञानी को भगवान् कहें।
प्रीत की रीत निराली जग में,
नीर क्षीर हो जाता है।
क्षीर बिके तब साथ मित्र को,
अपने भाव बिकाता है।
किन्तु कपटी षटरस उनसे,
आ जब मेल मिलाता है।
समता इतनी दूर करदे,
ना मेल फेर हो पता है।
भुवर्लोक,भू;लोक,तीसरा,
स्वर्ग लोक बतलाते हैं।
महर्लोक,जन लोक पांचवां,
आगे और सुनाते हैं।
सत्य लोक,तप लोक सातवां,
ऋषि मुनि फरमाते हैं।
सात लोक के नाम न्यूं,
“धर्मी” गुणी गवैये गाते हैं।
स्वर्ण की जो चोरी करता,
“धर्मीं” पतित कहाता है।
मदिरा के जो पीने वाला,
नीच गति को पाता है।
गुरुपत्नी को पत्नी कहता,
महा पतित कहलाता है।
ब्राह्मण की जो हत्या करता,
घोर नरक में जाता है।










