परमेश्वर से प्रीत कर मन अपने को जीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर
मन अपने को जीत कर
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर
परमेश्वर से प्रीत कर
इस दुनिया में सबसे ऊँचा
मानव का तन पाया है।
जीने वाले, साँस तुम्हारी
जीवन का सरमाया है।
वक्त रहेगा बीतकर,
सोच-समझ मनमीत कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर,
मन अपने को जीत कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर।
तन को तो मजबूत बनाया,
मन क्यों निर्बल तेरा है?
बाहर तूने दीप जलाए,
अंदर घोर अँधेरा है।
बातें न विपरीत कर,
मन को न भयभीत कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर,
मन अपने को जीत कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर।
जीवन है नदिया की धारा,
सुख-दुःख दो किनारे हैं।
इसी में आते-जाते,
कितने जन्म गुजारे हैं।
वर्तमान संगीत कर,
सफल भविष्य अतीत कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर,
मन अपने को जीत कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर।
आलस और अज्ञान के कारण,
धर्म-कर्म सब भूल गया।
धन-दौलत को सब कुछ समझा,
इस झूले पर झूल गया।
शुभ-कर्म संग्रहीत कर,
मुक्ति “पथिक” सुनिश्चित कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर,
मन अपने को जीत कर।
परहित, परोपकार में
जीवन को व्यतीत कर।
परमेश्वर से प्रीत कर।
रचनाकार :- पूज्य पण्डित श्री सत्यपाल जी “पथिक” अमृतसर
स्वर :- श्री सुखजीत सिंह जी – टोनी
साभार :- पथिक भजन संग्रह भाग 2 पृष्ठ 260
तर्ज :- सच्चा तू करतार है सब का पालनहार है
शीर्षक :- परमेश्वर से प्रीत कर
प्रकाशक :- आर्य प्रकाशन – अजमेरी गेट, दिल्ली










