इंसान नहीं इंसान रहा, बन गया है पशु समान।।
इंसान नहीं इंसान रहा,
बन गया है पशु समान।।
मानव-मानवता खो बैठा
न रही अपनी पहचान।।
मेरे भगवान, मेरे भगवान !
नित्यकर्म का ज्ञान नहीं,
बड़ों का आदर मान नहीं।
राम-भरत और शत्रुघ्न जैसे दीखे,
अब संतान नहीं।
अब माता-पिता और गुरुजनों का
होने लगा अपमान ।।
मेरे भगवान, मेरे भगवान !
वेदों का कुछ ज्ञान नहीं,
कहते हैं भगवान नहीं।
सन्ध्या हवन से प्रेम नहीं,
और शुभ कर्मों में दान नहीं।
बस एक ही नारा रह गया है,
रोटी कपड़ा और मकान।।
मेरे भगवान, मेरे भगवान !
मंदिर में नहीं आते हैं,
सिनेमा रोज ही जाते हैं।
अंडे मछली मांस है खाते,
व्हिस्की खूब उड़ाते हैं।
युवकों की ऐसी देख दशा,
होता है दुःख महान।।
मेरे भगवान, मेरे भगवान !
द्वार तेरे जो आता है,
मुँह मांगा फल पाता है।
मानव, मानव बन जाये,
‘नंदलाल’ यही अब चाहता है।
विनती है आपसे एक यही,
इंसान बने इंसान ।।
मेरे भगवान, मेरे भगवान !










