है अगरचे स्वर्ग में विश्राम श्रद्धानन्द का।

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है अगरचे स्वर्ग में विश्राम श्रद्धानन्द का।

है अगरचे स्वर्ग में
विश्राम श्रद्धानन्द का।
प्रलय तक जिन्दा रहेगा
नाम श्रद्धानन्द का।।1।।

धर्म की खातिर जिया वो,
धर्म की खातिर मरा।
जिस्म आया धर्म के ही,
काम श्रद्धानन्द का।।2।।

तज दिया घर वार उसने,
‘देश’ सेवा के लिये।
कौम के अर्पण था धन,
और धाम श्रद्धानन्द का।।3।।

हिन्दुओं के वास्ते,
कुर्बान कर दी उसने जान।
मौत ही हो क्यों न खासो,
आम श्रद्धानन्द का।।4।।

“अज्ञान, स्वार्थ व प्रलोभन के कारण धर्मांतरण कर बिछुड़े स्वजनों की शुद्धि करना, देश को मजबूत करने के लिए परम आवश्यक है” – स्वामी श्रद्धानन्द