कर स्वामी दयानन्द को, तैयार विरजानन्द ने।
कर स्वामी दयानन्द को,
तैयार विरजानन्द ने।
किया है सारे विश्व पर,
उपकार विरजानन्द ने।।
अन्दर के चक्षु खोल के,
देखा तो सारे देश में।
अज्ञान और पाखण्ड का,
अन्धकार विरजानन्द ने।।1।।
तब दे के ज्योति वेद की,
हाथों से दयानन्द को।
फिर से प्रकाशित कर दिया,
संसार विरजानन्द ने।।2।।
तन-मन से दयानन्द ने,
गुरुवर की जो सेवा करी।
बदले में दिया ज्ञान का,
भण्डार विरजानन्द ने।।3।।
गुरुदक्षिणा में मांगा तो,
मांगा ये दयानन्द से।
आयु पर्यन्त वेद का,
प्रचार विरजानन्द ने।।4।।
गायत्री माँ की गोद में,
श्रद्धा के साथ बैठ के।
परमात्मा का पा लिया था,
प्यार विरजानन्द ने।।5।।
सदियों की दासता से ‘पथिक’
मुक्ति आज मिल गई।
बोया था जिसका बीज ही,
फलदार विरजानन्द ने। ।6।।
स्वामी दयानन्द मेरे गुरु हैं। वे मेरे धर्म के पिता हैं और आर्यसमाज मेरी धर्म की माता है।” – लाला लाजपत राय










