ऐ ऋषि दयानन्द तेरी, युग-युग तक अमर कहानी।

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ऐ ऋषि दयानन्द तेरी, युग-युग तक अमर कहानी।

ऐ ऋषि दयानन्द तेरी,
युग-युग तक अमर कहानी।
हम भूल नहीं सकते हैं,
की तूने जो कुर्बानी।।

तू धर्म का था दीवाना,
सचाई का परवाना।
तू झुका सत्य के आगे,
तेरे आगे झुका जमाना।।

सुन तेरी अद्भुत वाणी,
दुनिया हो गई दीवानी।
हम भूल नहीं सकते हैं,
की तूने जो कुर्बानी।।1।।

लाखों भूले-भटकों को,
तूने मार्ग दिखलाया।
जो श्रद्धा करके आया,
उसे श्रद्धानंद बनाया।।

सच तो यह है मुर्दों को,
बख्शी तूने जिन्दगानी।
हम भूल नहीं सकते हैं,
की तूने जो कुर्बानी।।2।।

बन सच्चा ‘सेवक’ तूने,
की देश धर्म की सेवा।
लाखों तेरे अनुयायी,
सबको बाँटा यह मेवा।।

मिलकर जो हम बैठे हैं,
सब तेरी मेहरबानी।
हम भूल नहीं सकते हैं,
की तूने जो कुर्बानी।।3।।