स्वामी दयानन्द न आते, कल्याण हमारा न होता।

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स्वामी दयानन्द न आते, कल्याण हमारा न होता।

स्वामी दयानन्द न आते,
कल्याण हमारा न होता।
कांटों से उलझकर रह जाते,
और कोई सहारा न होता।।

वो कौन-सा दिल है,
ऋषि जिसमें बसा नहीं।
वो सबका देवता है,
किसी एक का नहीं।।
वो कौन सा दिल है, ऋषि जिसमें ……

थोड़े से वक्त में भी,
इतना काम कर गया।
ऐसा कभी तारीख में,
देखा सुना नहीं।।
वो कौन सा दिल है, ऋषि जिसमें…..

जुल्मों सितम की बारिश,
लालच की आँधियाँ।
इतने गजब की बात करके,
वह पल भर रुका नहीं।।
वो कौन सा दिल है, ऋषि जिसमें ……

ईश्वर के वेद ज्ञान को,
घर-घर पहुँचा दिया।
अज्ञान का दामन कहीं दिखता नहीं।।
वो कौन सा दिल है, ऋषि जिसमें……

वेदों का जाम आदमी,
पीता है एक बार।
जीवन से ऊब जाए वो,
ऐसा नशा नहीं।।
वो कौन सा दिल है, ऋषि जिसमें……

यों तो सारे जहान में,
कई रहनुमा हुए पर।
स्वामी दयानन्द का,
मुकाबला नहीं।।
वो कौन सा दिल है, ऋषि जिसमें…..