कण-कण वासी अन्तर्यामी
कण-कण वासी अन्तर्यामी,
प्रभु भुलाना ठीक नहीं।
कर के झूठी मनोकल्पना,
मन बहलाना ठीक नहीं।
कण-कण वासी अन्तर्यामी, प्रभु………
निराकार भगवान कहीं,
आँखों से कभी नहीं दिखता।
उस परमेश्वर की प्रतिमा,
या चित्र बनाना ठीक नहीं।
कण-कण वासी अन्तर्यामी, प्रभु……..
सूरज-चांद-सितारे जिसने,
अरबों दीप जलाये हैं
उसके हेतु किसी तरह का,
दीप जलाना ठीक नहीं
कण-कण वासी अन्तर्यामी, प्रभु ……….
जिसके हाथ-पाँव मुखमण्डल,
गरदन और शरीर नहीं उसे खिलाना,
भोग लगाना, दूध पिलाना ठीक नहीं।
कण-कण वासी अन्तर्यामी, प्रभु…….
धरती अम्बर सागर नदियाँ,
जिसका पानी भरते हैं
उसको नित्य स्नान कराना,
या नहलाना ठीक नहीं।
कण-कण वासी अन्तर्यामी, प्रभु…….
सुबह-सवेरे मन्दिर में
सोया भगवान जगाने को।
शंख नगाड़े घंटे या घड़ियाल
बजाना ठीक नहीं।
कण-कण वासी अन्तर्यामी, प्रभु ………
‘पथिक’ जमाना बीत गया,
इन लोगों को समझाने में
न समझे न समझेंगे,
फिर समझाना ठीक नहीं।
कण-कण वासी अन्तर्यामी, प्रभु……










