ईश महिमा
निराकार वह ईश है, हाथ पग न कान।
बिन जिह्वा बिन लेखनी, रचा वेद का ज्ञान।।
चलता-फिरता है नहीं, सभी ओर विद्यमान ।
अचल अमूरत एक रस, केवल वह भगवान् ।।
आदि अन्त उसका नहीं, नहीं नाश का मूल।
सुमिरन कर उस ईश को, हे प्राणी मत भूल।।
जिसकी छाया अमर है, जिसके परे विनाश।
वाणी जिसकी अजर है, हृदय करे प्रकाश।।
पालक पोषक जगत् का, सबका पिता महेश।
विद्यमान सर्वत्र है, अजर अमर अखिलेश।।
रूप रंग उसका नहीं, सब रंग रहा विराज।
मित्र शत्रु राखे नहीं, है जग का अधिराज।।
माता-पिता उसके नहीं, नहीं कुटुम्ब परिवार।
अवगुण उसमें है नहीं, गुण का है भंडार।।
जन्म-मरण उसका नहीं, बालक वृद्ध जवान।
भाई-बन्धु राखे नहीं, सब उसकी संतान।।
खाता-पीता है नहीं, पाँच तत्व से दूर।
दयावान् सबसे बड़ा, प्रेम करे भरपूर।।










