कैसे जानेंगे भगवान् को
कैसे जानेंगे भगवान् को नर पापी हो गये।
मन मंदिर में कभी किसी दिन झाडू नहीं लगाया।
दुर्गुण दुर्व्यसनों से सारा जीवन मलिन बनाया।
भूले हैं वेदों के ज्ञान को ।। नर०
झूठे वाद-विवादों में नित वक्त कीमतें खोवें ।
मानव चोला पाकर के भी पड़े आलसी सोवें।
तज के धर्म-कर्म-ईमान को ।। नर०
खाना पीना ही जीवन का समझा सच्चा सार।
इसी लगन में आज देख लो दौड़ा सब संसार ।
अमृत समझ रहे विषपान को ।। नर०
तन के उजले मन के मैले बगुला जैसे भेष।
भ्रष्टाचारी भक्त बने हैं अब नर-नार विशेष ।
गावें ना ईश्वर के गान को ।। नर०
ईश्वर से क्यों विमुख हुए यह कारण हमने जाना।
कह ‘नरदेव’ अविद्या में फँस गये लोग यह माना।
अच्छा समझ रहे अज्ञान को ।। नर०
























