‘स्वराज्य’ का मंत्रदाता- वह संन्यासी

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Swarajya ka mantra data

-श्री अनूप सिंह

जब स्वराज्य मन्दिर बनेगा तो उसमें बड़े-बड़े नेताओं की मूर्तियाँ होंगी और सब से ऊँची मूर्ति दयानन्द की होगी।” – श्रीमती एनीबोसेंट

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने अमर ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के अष्टम् समुल्लास के अन्तर्गत सन् १८७५ में स्पष्ट शब्दों में लिखा था- “कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। मतमतांतर के आग्रह रहित अपने और पराये का पक्षपात शून्य प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्णसुखगामी नहीं होता।”

डा० एनीबीसेंट ने अपनी पुस्तक ‘इण्डिया ए नेशन’ में लिखा है- “स्वामी दयानन्दजी ने सर्वप्रथम घोषणा की थी कि भारत भारतीयों के लिए है।”

महान क्रान्तिकारी स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने कहा था- “महर्षि दयानन्द स्वाधीनता संग्राम के सर्वप्रथम योद्धा, हिन्दू जाति के रक्षक थे।” कांग्रेस के मंच से ‘स्वराज्य’ शब्द का सर्वप्रथम उच्चारण सन् १६०६ में दादा भाई नौरोजी ने किया था। पाठकवृन्द यह जानकर आश्चर्य चकित होंगे कि दादा भाई नौरोजी ने स्वराज्य शब्द महर्षि दयानन्द के अमर ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ से ही लिया था। २० अक्तूबर, १९६६८ के सैनिक समाचार ने अपने अंक में लिखा था “दादा भाई नौरोजी पहले सज्जन थे जिन्होंने भारत पर अंग्रेजों के अधिकार जमाए रखने के विरुद्ध लिखा। वे पहले हिन्दुस्तानी थे जिन्होंने शब्द स्वराज्य (स्वशासन) प्रयुक्त किया। एक दिन लोकमान्य तिलक ने हैरान होकर देखा कि पारसी देशभक्त दादा भाई नौरोजी ‘सत्यार्थप्रकाश’ के पन्ने पलट रहे हैं। आपने विनोद में पारसी देशभक्त से प्रश्न किया-‘क्या आप आर्यसमाजी बन गए हैं ?’ ‘नहीं, मुझे स्वराज्य समर में स्वामी दयानन्द के ग्रन्थ से भारी प्रेरणा प्राप्त होती है । दादा भाई जी ने उत्तर दिया।”

लोकमान्य तिलक ने सन् १९१६ में स्वराज्य जन्म सिद्ध अधिकार होने की घोषणा की थी। परन्तु स्वामी दयानन्द सरस्वती के विषय में स्वयं लोकमान्य ने लिखा “ऋषि दयानन्द जाज्वल्यमान नक्षत्र थे, जो भारतीय आकाश पर अपनी अलौकिक आभा से चमके और गहरी निद्रा में सोये हुए भारत को जागृत किया। स्वराज्य के वे सर्वप्रथम संदेशवाहक तथा मानवता के उपासक थे।”

११ नवम्बर, १९५० को ऋषि निर्वाणोत्सव पर श्रद्धांजलि देते हुए लौह पुरुष सरदार पटेल ने कहा – “स्वामी दयानन्द जी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने देश को किकत्तंव्यविमूढ़ता के गहरे गड्ढे में गिर जाने से बचाया। उन्होंने भारत की स्वाधीनता की वास्तविक नींव डाली थी।”

भूतपूर्व रक्षामंत्री श्री महाबीर त्यागी ने कहा- “मुझे इस बात के स्वीकार करने में तनिक भी संकोच नहीं कि स्वामी दयानन्द ने ही भारत की स्वतंत्रता का वृक्ष लगाया, महात्मा गांधी ने उसे सींच कर बड़ा किया।”

और महान् दार्शनिक डा० राधाकृष्णन् ने कहा- “महर्षि दयानन्द ने राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक उद्धार का बीड़ा उठाया… स्वामीजी ने स्वराज्य का जो सबसे पहला संदेश हमें दिया था, उसकी आज हमें रक्षा करनी है।”

श्रीमती एनीबीसेंट ने तो कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में यहां तक कहा था- “जब स्वराज्य मन्दिर बनेगा तो उस में बड़े-बड़े नेताओं की मूतियां होंगी बऔर सब से ऊंची मूति दयानन्द की होगी।”

आओ आज स्वाधीनता दिवस के पावन अवसर पर स्वराज्य के मंत्र दाता उस संन्यासी का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण कर उसके श्री चरणों में बद्धां- जलि अर्पित करें।

(वीर अर्जुन से साभार)