भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं है।
(तर्ज- हम देश के सेवक हैं यह है हिन्द प्यारा)
- भगवान के घर देर है अन्धेर नहीं है। अन्धेर नहीं है।
उस ऊँची अदालत में हेर फेर नहीं है। अन्धेर नहीं है।
भगवान् के घर देर है………….
१. सुनते हैं घट पाप का भरता तो खूब जाए।
फिर अपने भार से ही पल भर में डूब जाए।
इन्साफ़ में लगती है जो वह ‘देर नहीं है।
भगवान् के घर देर है…………
२. देखो नियत समय पर सूरज निकलता ढलता।
अनुकूल वक्त लेकर दुनियाँ में पेड़ फलता।
बिन वक्त यहाँ शाम और सवेर नहीं है।
भगवान् के घर देर है………….
३. बोलो जहाँ में किस का सिक्का सदा चला है।
नामो निशान इक दिन दुनियाँ से मिट गया है।
कब रेत की दीवार बनी ढेर नहीं है।
भगवान् के घर देर है………….
४. ख़ुद को ‘पथिक’ मिटा के जो धूल में मिलेगा।
इक दिन इसी चमन में वह फूल बन खिलेगा।
फल सबर का मीठा है उलट फेर नहीं है।
भगवान् के घर देर है…………










