हम सत्यवादियों की शरण में रहें

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ऋतर्वान ऋतर्जाता ऋता॒वृधौ घोरासौ अनृत॒द्विषः ।

तेषां वः सुम्ने सु॑च्छर्दिष्टमे नर्ः स्याम् ये च सूरय॑ः ॥ ऋ. ७.६६.१३

तर्जः मला लावल्या ध्यान

सुख बरसाओ आदित्यो जानें तुम्हारी महिमा
तुम नेतृत्व के करने वाले, नर हो हे सुम्ना ! ॥ ॥ सुख बरसाओ॥

अग्रणी नेता तुम हो जग के (2) सुखमयी शरण पायें शरणागत
शरण पाये बिन हुए अकेले (2) कुछ तो दया करना॥ ॥ सुख बरसाओ॥

ब्रह्मचर्य अखण्ड धार के (2) दिव्य ज्योति चहुँ ओर प्रसारते
तुम हो ऋत के परम उपासक (2) अंश कहीं ना अनृत का॥
॥ सुख बरसाओ॥

शुद्ध भावप्रद सत्य का सेवन (2) और असत्य का करते भेदन
यही रहस्य है उन्नत पद का (2) और अनन्त गरिमा॥
॥ सुख बरसाओ॥

ऋतावान संग ऋतजात भी, (2) अणु अणु में सत्य-प्रकाश भी
परिपूरित फिर यज्ञभाव भी, (2) सत्यरूप प्रतिभा॥
॥ सुख बरसाओ॥

त्याग के अनृत, सत्य की वृद्धि, (2) ऋतावृध बन पायें सिद्धि
पड़े कहीं ना अनृत छाया, (2) सुनना सत्य कहना।
॥ सुख बरसाओ॥

इसीलिये ऋतवान हे नरो! (2) सत्यसेवी हमको भी कर दो
सर्वश्रेष्ठ सुम्नों को पाकर, (2) प्रतिरूप बनें प्रतिमा॥
॥ सुख बरसाओ।

सूरि बनें, पायें अमृत को (2) हमको सुख देना आदित्यो !
सर्व श्रेष्ठ सुख लें शरणागत, (2) हे सुख-भावालीना !॥ ॥ सुख बरसाओ॥

(प्रतिरूप) वैसा ही रूप, छाया। (आदित्यो) संसार के प्रकाशक। (सुम्ना) सुख ऐश्वर्य
वाले। (अग्रणी) आगे ले जाने वाले। (ऋत) सृष्टि नियम। (अनृत) सृष्टि नियमों के विपरीत।
(सूरि) ज्ञानी। (भावालीना) छाँव, छाया। (भावप्रद) भावों से सिक्त, भाव भीने। (भेदन)
छिन्न भिन्न करना, तोड़ना। (गरिमा) गौरव। (ऋतवान) सत्य व यज्ञ से युक्त।