चलते-चलते यात्रा से हम थक जाते हैं

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चलते-चलते यात्रा से हम थक जाते हैं

चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं
जीवन यात्रा में, संघर्ष को पाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

जब संघर्ष से हमको गुजरना पड़ा
थक के हो गए चूर तो रुकना पड़ा
जब निराशा में मन घबराने लगा
गहरी चिन्ता उदासी से घिर जाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

घोड़े को चलते-चलते विश्राम चाहिए
जो सवार है, उसे बुद्धिमान चाहिए
जल पिलाए उसे खूंटे से बांध कर
वह उसे रसमय हरी घास खिला जाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

अश्व मन रूपी चाहे विश्राम सुगम
हाथ में खूंटा लिए बैठे भगवन्
वाणी भक्ति का रूप है रज्जू प्रशम
कण्ठ भक्ति से गदगद हो जाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

जब प्रभु की भक्ति में बंध जाता मन
प्रेम अवरुद्ध होकर के गाता भजन
जब कृतज्ञता से पूर्ण करें प्रार्थना
शक्ति, शान्ति, संतोष, उत्साह पाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

कर्मशीलता, निर्भयता, आत्मप्रसाद
उत्पन्न करता ना हममें विघातक प्रमाद
भागते ना हम डर के, ना पाते विषाद
विजय पाने में उत्साह हम लाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

खूंटे से बंध के पाते हैं हम प्रभु से भोग
होते हैं प्राणमय दुःख के हटते हैं रोग
दौड़ने को हो जाते हैं फिर से सक्षम
मन के रथ में सुमार्ग-गति पाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

मन हमारा जब पापों से हो ‘संदीतम्’
तो निराशा को छोड़, ले प्रभु की शरण
सी ले भक्ति के धागे से विक्षिप्त मन
आत्मा चल, प्रभु के खूंटे से बंध जाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं
जीवन यात्रा में, संघर्ष को पाते हैं
चलते-चलते यात्रा से, हम थक जाते हैं

ओ३म् वि मृ॑ळी॒काय॑ ते॒ मनो॑ र॒थीरश्वं॒ न संदि॑तम् ।
गी॒र्भिर्व॑रुण सीमहि ॥
ऋग्वेद 1/25/3

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई